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सूर्य के पास आदित्य

भारतीय अंतरिक्ष यान आदित्य एल1 को हासिल ऐतिहासिक कामयाबी सुखद और स्वागतयोग्य है। अंतरिक्ष विज्ञान में भारत की एक और यादगार कामयाबी ने देश को गर्व का अच्छा अवसर दिया है और इससे देश में युवाओं के बीच...

सूर्य के पास आदित्य
Pankaj Tomarहिन्दुस्तानSun, 07 Jan 2024 11:38 PM
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भारतीय अंतरिक्ष यान आदित्य एल1 को हासिल ऐतिहासिक कामयाबी सुखद और स्वागतयोग्य है। अंतरिक्ष विज्ञान में भारत की एक और यादगार कामयाबी ने देश को गर्व का अच्छा अवसर दिया है और इससे देश में युवाओं के बीच विज्ञान के प्रति लगाव में वृद्धि होगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को स्वाभाविक ही वैज्ञानिकों को उनकी असाधारण उपलब्धि के लिए बधाई दी है। भारत का सौर अभियान बिल्कुल योजना और समय के अनुरूप चल रहा है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने शनिवार को सूर्य का अध्ययन करने वाली पहली अंतरिक्ष आधारित भारतीय वेधशाला, आदित्य एल1 को अपनी गंतव्य कक्षा लेगरेंज प्वॉइंट, यानी एल पी-1 में सफलतापूर्वक स्थापित कर दिया है। सूर्य के करीब अंतरिक्ष में स्थित इस विशेष जगह की सूर्य से दूरी करीब 15 लाख किलोमीटर रह गई है। इसके आगे यान को कक्षा में स्थापित करने से उसे नुकसान पहुंच सकता है और एल पी-1 कक्षा को यान के लिए सुरक्षित माना जा रहा है। जिस जगह यह यान स्थापित है, वहां से सूर्य लगातार नजर आएगा और दिन-रात का क्रम वहां बाधक नहीं बनेगा। 
चूंकि यह यान स्वयं अध्ययन में सक्षम है, इसलिए इसे वेधशाला भी कहा जा रहा है, जहां से अंतरिक्ष की गतिविधियों पर निगाह रहेगी। सूर्य के आस-पास होने वाले परिवर्तनों की पड़ताल हो सकेगी। सूर्य के आस-पास के वायुमंडल का अध्ययन बहुत जरूरी है और इसके लिए अभी तक अमेरिका ही ज्यादा सक्षम रहा है। इस वेधशाला आदित्य एल1 के प्रक्षेपण में सक्षम होने से भारत अंतरग्रहीय अध्ययन या अभियान में भी कामयाबी की दिशा में बढ़ चला है। इस अभियान से इसरो के आत्म-विश्वास में बहुत वृद्धि होगी। इसरो इस यान को धीरे-धीरे पूरी तरह से सक्रिय करेगा। आदित्य-एल1 में सात पेलोड शामिल हैं, जिनको अलग-अलग तरह के कार्यों को अंजाम देना है। इस यान से सबसे बड़ी मदद चित्र और परिवेश के अध्ययन के मोर्चे पर मिलने वाली है। विशेष रूप से सूर्य की बाहरी परत का अध्ययन आसानी से हो सकेगा। सूर्य की इस परत को कोरोना भी कहा जाता है। सौर कोरोना की भौतिकी और इसकी गरम होने की प्रक्रियाओं को गहराई से जानना, उसके तापमान में होने वाले बदलावों को परखना, उसके वेग और घनत्व का विश्लेषण करना प्रमुखता से संभव हो सकेगा। वैज्ञानिक आश्वस्त हैं कि इसरो यान में लगे सभी उपकरणों को सक्रिय कर देगा।
यह बहुत महत्पूर्ण बात है कि भारत अंतरिक्ष विज्ञान में ऐसे चुनिंदा देशों में शामिल है, जो अंतरिक्ष में एक यान या उपकरण को दूसरे यान या उपकरण से अलग करने और किसी भी कक्षा में स्थापित करने या यान को लौटाने में सक्षम हो गया है। चंद्रयान-3 के समय भी भारत ने ऐसा सफलतापूर्वक किया था। चंद्रयान-1 के समय भी यान को अंतरिक्ष में भेजना, यान से किसी यान का अलग करना और यान को वापस पृथ्वी की कक्षा में लाना मुमकिन हुआ था। ध्यान रहे, बहुत इंतजार के बाद पिछले ही साल भारत चंद्र्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर सफलतापूर्वक उतरने वाला पहला देश बना है। अब सूर्य की कक्षा में अभियान भेजने के मामले में भी सक्षम देशों में अमेरिका के बाद भारत का ही स्थान है, जर्मनी के जो अभियान हैं, वे अमेरिका के साथ मिलकर हैं। यूूरोपीय सौर अभियान अनेक मुल्क मिलकर चला रहे हैं, जबकि इस मोर्चे पर रूस या चीन पीछे हैं।  

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