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मिजोरम का फैसला

सारा ध्यान चार राज्यों पर ही था, इसलिए पूर्वोत्तर के छोटे से राज्य मिजोरम की चर्चा हमारे चुनावी-विमर्श में बहुत ज्यादा जगह नहीं पा सकी। यहां मतगणना एक दिन बाद होने से नतीजे व्यापक चर्चा में जगह...

मिजोरम का फैसला
Amitesh Pandeyहिन्दु्स्तानMon, 04 Dec 2023 10:26 PM
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सारा ध्यान चार राज्यों पर ही था, इसलिए पूर्वोत्तर के छोटे से राज्य मिजोरम की चर्चा हमारे चुनावी-विमर्श में बहुत ज्यादा जगह नहीं पा सकी। यहां मतगणना एक दिन बाद होने से नतीजे व्यापक चर्चा में जगह पा सके हैं। शुरू से ही मिजो लोगों का जो रुख था, वह यही बता रहा था कि इस राज्य में सत्ता-परिवर्तन लगभग तय है। पिछले चुनाव के कुछ पहले ही बनी पार्टी जोराम पीपुल्स मूवमेंट, यानी जेडपीएम को काफी समय से आगे बताया जा रहा था। हालांकि, इसमें शक था कि वह अपने बूते सरकार बना पाने की स्थिति में शायद न रहे और उसे कांग्रेस का समर्थन लेना पड़े, पर ऐसी नौबत नहीं आई। बाकी चारों राज्यों की तरह ही मिजोरम की जनता ने भी स्पष्ट जनादेश दिया और जेडपीएम को बहुमत से कहीं ज्यादा सीटें दे दीं। 
यह विधानसभा चुनाव उस समय हुआ है, जब पड़ोसी राज्य मणिपुर पिछले लंबे समय से जातीय हिंसा में झुलस रहा है और उसकी आंच मिजोरम के राजनीतिक तेवर में लगातार झलकती रही है। एक तरफ, मणिपुर से जान बचाकर भागे हजारों कुकी लोगों ने मिजोरम में शरण ली हुई है, तो दूसरी तरफ, यह समस्या राज्य के राजनीतिक समीकरणों में भी उलट-पुलट कर रही है। पिछले पांच साल में यहां मिजो नेशनल फ्रंट की सरकार थी, जो इसके साथ ही केंद्र में एनडीए गठजोड़ का हिस्सा थी, लेकिन मणिपुर समस्या ने फ्रंट को एक तरह से इस गठजोड़ से अलग कर दिया। जब इस मुद्दे पर विपक्षी दल नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ अवश्विास प्रस्ताव लेकर आए, तो फ्रंट के एकमात्र सांसद ने इस पर विपक्ष के साथ वोट किया। चुनाव प्रचार के दौरान भी पार्टी के नेता यही कहते रहे कि उनका भाजपा से कोई नाता नहीं है। वैसे, यह राजनीति भी काम नहीं आई और अपने निर्वाचन क्षेत्र में मुख्यमंत्री जोराम थंगा भी चुनाव हार गए। हालांकि, कारण सिर्फ मणिपुर की समस्या नहीं है। उनकी सरकार पर भ्रष्टाचार के बहुत आरोप थे। जेडपीएम के नेता लल्दूहोमा ने अपनी सभाओं में इसे बड़ा मुद्दा बनाया था। चुनाव जीतने के बाद भी उन्होंने भ्रष्टाचार खत्म करने को अपनी पहली प्राथमिकता बताया है।
इस राज्य में भाजपा का दांव बहुत बड़ा नहीं था। 2018 में पार्टी का एक उम्मीदवार ही चुनाव जीता था, वह भी ऐसा उम्मीदवार था, जो कांग्रेस से दल-बदल करके पार्टी में शामिल हुआ था। इस बार की तरह तब राज्य में माहौल भाजपा के खिलाफ नहीं था। इस बार भाजपा ने ज्यादा सीटों पर उम्मीदवार भी नहीं लड़ाए। पार्टी के केंद्रीय नेताओं ने राज्य के बहुत ज्यादा चुनावी दौरे भी नहीं किए, फिर भी पार्टी अपने दो उम्मीदवारों को चुनाव जितवाने में कामयाब रही। भाजपा ने उस कांग्रेस को पीछे छोड़ दिया, जो कभी मिजो राजनीति की एक बड़ी खिलाड़ी थी। 2018 से पहले तक वहां लगातार दस साल कांग्रेस की सरकार रही थी। 2018 के चुनाव में जेडपीएम के उभार ने उसे विधानसभा में तीसरे नंबर की पार्टी बना दिया था। पिछले दिनों जब राहुल गांधी आईजोल गए, तो वहां उमड़ी भीड़ से बहुत से लोगों ने यह अनुमान लगाए कि यहां कांग्रेस की सत्ता में वापसी हो सकती है। अब जब नतीजे सामने आ गए हैं, तब कांग्रेस मिजोरम में चौथे नंबर की पार्टी हो गई है। अब यहां से उसकी सत्ता में वापसी आसान नहीं होगी। अब उत्तर भारत में कांग्रेस की जो स्थिति है, पूर्वोत्तर भारत में उसकी स्थिति उससे बहुत अलग नहीं है। धीरे-धीरे पूर्वोत्तर में मजबूत हुई भाजपा के लिए आगामी लोकसभा चुनाव में उम्मीदें बढ़ गई हैं। 

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