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18 जनवरी, 2021|12:04|IST

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अच्छे विज्ञान की मांग 

आधुनिक दुनिया ने विज्ञान का महत्व बहुत पहले ही जान लिया था, लेकिन आज दुनिया एक ऐसे दौर में है, जब लगभग पूरी बागडोर ही विज्ञान के हाथों में दिखने लगी है। क्या भविष्य की राह विज्ञान और केवल विज्ञान द्वारा ही तय होगी? क्या अर्थव्यवस्था और सामाजिकता जैसे विषय अब प्राथमिक नहीं रहे, केवल विज्ञान ही प्राथमिक है? अब विज्ञान ही बोलेगा, तब हम घर से बाहर निकलेंगे? इन दिनों विज्ञान की प्राथमिकता सिद्ध होने का एक कारण यह भी है कि ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ने चिकित्सकीय चेतावनियों को हल्के में लिया था, इसकी कीमत उन्हें कोरोना पीड़ित होकर चुकानी पड़ी। पीड़ित होने के बाद वह मजबूरन विज्ञान की शरण में गए, अर्थव्यवस्था या सामाजिकता जैसे विषय उनके लिए गौण हो गए। इस अकेले उदाहरण ने दुनिया में असंख्य लोगों को मजबूर कर दिया कि वे विज्ञान की शरण में जाएं। अमेरिका में भी विज्ञान की अवहेलना हुई, पर जब वहां तबाही मची, तब अमेरिका भी विवश हो गया। आज अर्थव्यवस्था से शायद ही किसी को उम्मीद है, आज सामाजिकता झूठी-सी लग रही है, केवल विज्ञान की ओर लोग टकटकी लगाए बैठे हैं कि वह जल्द से जल्द कोई उपचार बताए।  दुनिया के वैज्ञानिकों के बीच यह भी चर्चा है कि क्या कोरोना के सामने विज्ञान नाकाम हो गया? कई डॉक्टरों का मानना है, हमने चिकित्सा तंत्र पर तो पूरा ध्यान दिया, लेकिन समाज-तंत्र को भूल गए। टेस्ट किट, मास्क, वेंटिलेटर, कुछ दवाइयां सुनिश्चित हो गईं, लेकिन डॉक्टरों या वैज्ञानिकों ने लोगों के सामाजिक व्यवहार के बारे में ज्यादा नहीं सोचा। जैसा केन्याई अर्थशास्त्री व बुद्धिजीवी डेविड नडी ने बताया, ‘हमारे चिकित्सा/ महामारी विशेषज्ञ रोग के स्रोत और प्रसार को समझते हैं, लेकिन वे लोक/ समाज को समझने में सक्षम नहीं हैं, और यह एक समस्या है।’
विज्ञान का पूरा लाभ उठाने में कमी तो रही है, लेकिन ध्यान रहे, जितनी कमी विज्ञान में थी, उससे कहीं ज्यादा कमी समाज में थी और कोविड-19 जैसी घातक बीमारी को भयावह होने के मंच जगह-जगह मिल गए। अप्रैल के खत्म होते-होते दुनिया में तीस लाख से अधिक लोग कोरोना संक्रमित हो गए और दो लाख से अधिक मारे गए। वैज्ञानिक भी यही मान रहे हैं कि हमें सारे फैसले विज्ञान पर नहीं छोड़ने चाहिए। विज्ञान वास्तव में यह नहीं बताता है कि हमें क्या करना है। इसकी बजाय वैज्ञानिक तमाम चीजों के बीच संबंधों को समझने-समझाने की कोशिश करते हैं, ताकि यह अनुमान लगाया जा सके कि हम क्या करेंगे, तो क्या हो सकता है। समाज या दौर कोर्ई भी हो, वास्तव में यह राजनीति तय करती है कि हमें क्या करना है। इसलिए कहा जाता है कि लोकतंत्र में जिस सरकार के पास जितनी ज्यादा सूचनाएं और पारदर्शिता होती है, वह उतने ही अच्छे फैसले लेती है। 
कोरोना के दौर में कई देशों की राजनीति व उनकी सरकार की पोल खुली है। जिन देशों ने अच्छे विज्ञान और बुरे विज्ञान में भेद करना छोड़ दिया था, जिनकी सर्वोच्च प्राथमिकता मानव जीवन नहीं रह गया था, वे कोरोना में ज्यादा फंसे। कोरोना एक बड़ा सबक है, इसके बाद हमें अच्छे विज्ञान की मांग और आपूर्ति को पर्याप्त निवेश करते हुए बढ़ाना है। फैसला हमें और हमारी सरकारों को करना है कि पोषण उसी विज्ञान का हो, जो दुनिया के ‘कोरोनाओं’ को धूल चटाता हमारे साथ चले।

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  • Web Title:hindustan editorial column 04 may 2020