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1 नवंबर, 2020|10:46|IST

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अमेरिका में चुनाव

हमारा ध्यान इस समय पूरी तरह बिहार चुनाव पर है। हमें लगता है कि बिहार विधानसभा का चुनाव भारतीय राजनीति की दशा और दिशा तय करेगा। लेकिन बाकी दुनिया की नजरें अमेरिका पर हैं। कल जब अमेरिकी मतदाता अपना राष्ट्रपति चुनने के लिए घर से निकलेंगे, तो वे अपने वोट से दुनिया की बहुत सारी नीतियां भी तय कर देंगे। इस मामले में अमेरिकी मतदाताओं के पास जो अवसर होता है, वह दुनिया के किसी और देश के मतदाताओं के पास नहीं होता। इसलिए उसका महत्व भले ही बिहार विधानसभा चुनाव जितना न हो, लेकिन हमारे लिए अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव भी कम अहमियत नहीं रखते। बिहार के चुनाव हमारी राजनीति को भीतर से बदल सकते हैं, तो अमेरिका के चुनाव उन बाहरी दबावों को बदलेंगे, जिनमें कोई देश अंतरराष्ट्रीय राजनय में अपनी यात्रा तय करता है। अमेरिका के चुनाव भारत समेत पूरी दुनिया के लिए एक और कारण से महत्वपूर्ण हैं, जिन पर हम बाद में आएंगे। पहले जायजा अमेरिका के राजनीतिक परिदृश्य का।
अमेरिका का यह राष्ट्रपति चुनाव उस समय हो रहा है, जब कोरोना वायरस ने दुनिया के इस सबसे शक्तिशाली माने जाने वाले देश को बुरी तरह झकझोर दिया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बड़बोलेपन और उनकी डींगों की जितनी पोल इस दौरान खुली है, उतनी उसके पहले कभी नहीं खुली थी। शायद पूरे अमेरिकी इतिहास में किसी भी राष्ट्रपति की पोल इस तरह से नहीं खुली। इस सच को तो अमेरिका में ज्यादातर लोग स्वीकार कर रहे हैं कि ट्रंप कोरोना संक्रमण से देश को बचाने में बिलकुल ही नाकाम रहे हैं। देश को ही क्यों, वे खुद को भी संक्रमण से नहीं बचा सके। इस पूरे दौर में सोशल मीडिया पर उन्हें एक मसखरे के तौर पर भी पेश किया जाता रहा है, जबकि उनके प्रतिद्वंद्वी जो बिडेन की छवि अभी भी गंभीर राजनेता की ही बनी हुई है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि ट्रंप के दिन अब पूरे हो रहे हैं। यह माना जाता है कि ट्रंप के पास एक ज्यादा कट्टर समर्थक वर्ग है, यह भी माना जाता है कि ट्रंप का एक बाकायदा कल्ट है, जो कोई दूसरी बात सुनने को तैयार नहीं होता। चुनाव ऐसे समय हो रहे हैं, जब अमेरिकी समाज भी काफी उथल-पुथल से गुजर रहा है। ‘ब्लैक लाइव्स मैटर्स‘ जैसे आंदोलन ने अश्वेत समाज के गुस्से और अलगाव को सतह पर ला दिया है। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि इस असंतोष के बीच होने वाला मतदान किसके पाले में जाएगा। 
पिछले कुछ समय में तकरीबन पूरी दुनिया में ही एक ऐसी लहर चली थी, जिसमें रूढ़िवादी या दक्षिणपंथी विचारधाराओं के नेता कई देशों की सत्ता पर काबिज हुए। ट्रंप भी उन्हीं में एक हैं, और शायद सबसे ज्यादा बेपरवाह और बड़बोले भी। अब जब ऐसे नेताओं की पकड़ कमजोर होने के संकेत मिल रहे हैं, तो ट्रंप की हार इस रुझान पर पक्की मुहर मानी जाएगी। इसका अर्थ होगा दुनिया में उदार कूटनीति और राजनय का लौटना। इन चुनावी नतीजों का भारत के साथ अमेरिका के रिश्तों पर कोई बड़ा फर्क पड़ेगा, अभी तक तो ऐसा नहीं लगता। यह जरूर है कि अगर बिडेन जीतते हैं और कमला हैरिस उप- राष्ट्रपति बनती हैं, तो भारतीयों के लिए एक गर्व का क्षण होगा। अमेरिका में रहने वाले भारतीयों और भारतवंशियों के लिए तो खैर यह बड़ी बात होगी ही। फिलहाल इसमें कोई और बड़ी उम्मीद नहीं देखनी चाहिए।

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  • Web Title:hindustan editorial column 02 november 2020