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संपादकीय

पीछे ले जाने वाला विचार

हिन्दुस्तानPublished By: Naman Dixit
Wed, 01 Sep 2021 03:01 AM
पीछे ले जाने वाला विचार

काबुल में तालिबान के काबिज होने के साथ अफगानी बच्चियों और औरतों के भविष्य को लेकर जब पूरी दुनिया चिंता में डूबी हुई है, तब भारत में जमीयत उलेमा-ए-हिंद के सदर अरशद मदनी का यह बयान कि लड़कियों और लड़कों की शिक्षा अलग-अलग होनी चाहिए, एक प्रतिगामी विचार तो है ही, भारतीय संविधान की मूल भावना के भी खिलाफ है। कोई भी तरक्कीपसंद हिन्दुस्तानी उनकी इस राय को सिरे से खारिज ही करेगा। इसलिए केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने मदनी को मुनासिब याद दिलाया है कि भारत शरीयत से नहीं, बल्कि संविधान से संचालित एक जम्हूरी मुल्क है, और भारतीय संविधान ने अपनी बेटियों को बेटों के बराबर सांविधानिक अधिकार दिए हैं। एक नागरिक के तौर पर अपने बेहतर भविष्य के लिए वे हर वह फैसला कर सकती हैं, जो इस देश के लड़कों को हासिल है। और इस लैंगिक बराबरी की राह में जो कुछ रुकावटें बाकी भी हैं, उन्हें देश की आला अदालत अपने फैसलों से दूर कर रही है। 
अरशद मदनी ने कहा है कि लड़कियों और लड़कों के लिए अलग-अलग स्कूल-कॉलेज खोले जाने चाहिए। देश में लड़कियों के लिए अलग स्कूल भी हैं व कॉलेज भी, और इनका स्त्री शिक्षा के क्षेत्र में काफी अहम योगदान भी रहा है। निस्संदेह, इनकी स्थापना के पीछे कभी यह सोच रही हो कि चूंकि कई माता-पिता अपनी बच्चियों को सहशिक्षा केंद्रों में नहीं भेजना चाहते, इसलिए उन्हें शिक्षा के अवसर से वंचित न होना पडे़। पर मदनी शायद भूल गए कि उन स्कूलों-कॉलेजों से लड़कियों की कई पीढ़ियां निकल चुकी हैं। 21वीं सदी के भारतीय समाज ने सोच के स्तर पर भी लंबा सफर तय कर लिया है। देश के सभी वर्गों की बेटियां आज मुख्यधारा में शामिल हो तरक्की की नई-नई इबारतें लिख रही हैं।
कई इस्लामी मुल्कों में भी सहशिक्षा की व्यवस्था है, और वह बाकायदा चल रही है। आने वाले दौर की जरूरतों और तेजी से बदलती दुनिया के मद्देनजर अरब देशों को औरतों पर लगी पाबंदियां आहिस्ता-आहिस्ता उठानी पड़ रही हैं। कतर जैसे देश में तो लड़कियों को खेल-कूद तक में बराबरी का हक मिलने लगा है। वहां लड़के-लड़कियों की साक्षरता-दर में मामूली सा फर्क रह गया है। ऐसे में, बोसीदा ख्यालों को अब मुस्लिम समाज से भी बहुत समर्थन नहीं मिल सकता। तीन तलाक के मसले पर देश ने देखा है कि किस कदर महिलाओं ने नए कानून का स्वागत किया। इन बदलावों को देखते हुए भी मजहबी इदारों में बैठे लोगों को अतार्किक बातों से परहेज करना चाहिए। बल्कि उनसे उम्मीद की जाती है कि तंग दायरों से निकल वे समाज का मार्गदर्शन करें। यह समस्या सिर्फ एक धर्म, बिरादरी या स्कूल की नहीं है। लगभग सभी धर्मों, बिरादरियों में ऐसे लोग मौजूद हैं, जो औरतों को खुदमुख्तारी देने को लेकर उदार नजरिया नहीं रखते। हिफाजत, मर्यादा, गरिमा, आबरू जैसे शब्दाडंबरों के नीचे उनकी अपनी मरजी को दबा देना चाहते हैं। मगर भारतीय स्त्रियों का यह सौभाग्य है कि देश के नव-निर्माताओं ने आजादी के साथ ही बराबरी के उनके हक पर सांविधानिक मुहर लगा दी। यकीनन, उन्हें सामाजिक बराबरी के लिए अब भी लड़ना पड़ रहा है, पर इस लड़ाई में उनका संविधान उनके साथ खड़ा है। इसलिए उन्हें मदनी जैसे ख्यालों से चिंतित होने की जरूरत नहीं।
 

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