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दुनिया में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले ग्रेगोरियन कैलेंडर पर साल बदल गया। अब हम साल 2024 के आने के सुखद एहसास से भरे हुए हैं। हम मनुष्यों ने समय के साथ बढ़ते हुए इस धरती पर अनगिनत अच्छे मुकाम...

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Pankaj Tomarहिन्दुस्तानSun, 31 Dec 2023 11:22 PM
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दुनिया में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले ग्रेगोरियन कैलेंडर पर साल बदल गया। अब हम साल 2024 के आने के सुखद एहसास से भरे हुए हैं। हम मनुष्यों ने समय के साथ बढ़ते हुए इस धरती पर अनगिनत अच्छे मुकाम देखे हैं और तमाम जीवों के बीच सबसे ज्यादा तरक्की की है, इसलिए हम प्राकृतिक रूप से बहुत आशावादी हैं। सदैव बेहतर बदलाव के इच्छुक और आने वाले हर पल के लिए अनायास खुशी से सराबोर। सदियों से हमें हर दिन उगते सूरज के साथ पढ़ाया और बताया जाता रहा है कि आज कुछ न कुछ बेहतर होगा। पिछले तीन-चार वर्षों में दुनिया ने एक भयानक महामारी का कहर झेला है। बेशक, बीता साल 2023 हमारे लिए महामारी से उबरने का वर्ष रहा, किंतु बुरे तजुर्बे के बावजूद हम ज्यादा कुछ सीख नहीं पाए। तभी तो दुनिया में कम से कम दो जगह, यूक्रेन और गाजा में युद्ध का मंजर है। जहां मनुष्य ही मनुष्य रक्त के प्यासे हो रहे हैं और शायद 2024 में उनकी यही कामना होगी कि कथित दुश्मन का मान मर्दन हो जाए या दुश्मन के खून की नदियां बह जाएं। अत: नए साल में पहली आकांक्षा यही उमड़ती है कि किसी भी तरह इस साल युद्ध से हम बाज आएं।
युद्ध हो या परस्पर हिंसा वास्तव में यह समग्रता में हम मानवों की बुद्धिमत्ता पर सवाल है। जाति, नस्ल व सांप्रदायिक आधार पर होने वाले शर्मनाक संघर्ष धर्म, मजहब और शिक्षा पर सवाल हैं। बेहद विकसित कहलाने वाले देश अमेरिका में कोई नफरती व्यक्ति बंदूक उठाता है और लोगों को अंधाधुंध मारने लगता है। अन्य उभरती महाशक्ति चीन में कोई सत्ता से अलग विचार रखता है, तो मिटा दिया जाता है। और विडंबना देखिए, अक्सर ये दो कथित महाशक्ति देश मानवाधिकार और शासन-प्रशासन के लिए दूसरे देशों पर नसीहतों की बौछार कर देते हैं। दुनिया की महाशक्तियों का वैश्विक कुतर्क शर्मनाक है, कोई इजरायल के साथ खड़ा है कि वह दुश्मनों को बर्बरता के साथ खत्म करे, तो कोई भारत को सलाह दे रहा है कि आतंकियों से संवाद करो और उनके अनुकूल हल निकालो। नए साल में क्या वैश्विक स्तर पर दुनिया के महाशक्ति देश ज्यादा न्यायपूर्ण और समावेशी होंगे? ध्यान रहे, दूसरे देशों में घुसने का दुस्साहस पहले अमेरिका ही ज्यादा करता था, वह अफगानिस्तान को अपने हाल पर छोड़ लौट गया, पर अब रूस और चीन के साम्राज्यवादी मनसूबे आए दिन चिंता बढ़ा रहे हैं। जहां अमेरिका, रूस और चीन जैसे वीटो पावर वाले देश किसी न किसी तरह की मनमानी को तवज्जो देते हों, वहां संयुक्त राष्ट्र बस एक नाम पट्टिका भर होता जा रहा है। क्या भारत, ब्राजील, संयुक्त अरब अमीरात, जापान जैसे देशों की भागीदारी को स्थाई बनाते हुए संयुक्त राष्ट्र विश्व हित में जागेगा?
यह नया साल अनगिनत उम्मीदें लिए आया है। कोरोना के बाद सुधरती अर्थव्यवस्थाओं को दुस्साहस, अत्यधिक मुनाफाखोरी, भ्रष्टाचार और किसी भी तरह की लूट से बचते हुए गरीबों को ध्यान में रखकर काम करना होगा। नए साल में हर किसी को अपनी भूमिका के बारे में तार्किक ढंग से सोचना होगा। परिवार-समाज में खुशी की बुनियाद यही है कि हम खुद के लिए जैसे व्यवहार की उम्मीद दूसरों से करते हैं, हमें सभी के साथ वैसा ही व्यवहार करना चाहिए। नए साल में यह संकल्प हर किसी के लिए जरूरी है कि हम समाधान में भागीदार बनेंगे, समस्याएं नहीं बढ़ाएंगे। इसमें कोई शक नहीं कि जब लोग सुधरते-सुधारते हैं, तो शासन-प्रशासन में जल्दी सुधार आता है। 

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