DA Image
8 अप्रैल, 2020|2:23|IST

अगली स्टोरी

अदालत की नाराजगी

टेलीकॉम कंपनियों की बकाया राशि के बारे में सुप्रीम कोर्ट के गुस्से को समझा जा सकता है। सुप्रीम के निर्देश के बाद, अंतिम तारीख गुजर जाने के बाद भी अगर कंपनियों ने 94 हजार करोड़ रुपये की बकाया राशि सरकार के पास नहीं जमा की, तो यह सीधे-सीधे मानहानि का मामला तो है ही। लेकिन इसमें एक और तथ्य यह जुड़ गया है कि एक सरकारी आदेश ने ही उन्हें पैसा न जमा कराने का तर्क दे दिया। इन कंपनियों को यह धनराशि इस साल 23 जनवरी तक जमा करवानी थी, लेकिन अनेक कंपनियों ने यह रकम नहीं जमा करवाई। 

इस बीच संचार विभाग की तरफ से एक परिपत्र जारी हो गया, जिसमें यह लिखा गया था कि अगर सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के मुताबिक ये कंपनियां इस रकम को नहीं जमा कर पाती हैं, तो उनके खिलाफ कोई सख्ती न बरती जाए। टेलीकॉम कंपनियों द्वारा रकम न जमा करवाने से ज्यादा अदालत का गुस्सा इसी पत्र पर था। इसलिए कोर्ट ने इस पर जो टिप्पणी की, वह अपवाद रूप में काफी सख्त है। 

जाहिर है, इन कंपनियों के साथ ही इस आदेश को जारी को जारी करने वाले अधिकारी के खिलाफ भी मानहानि का मामला बनता है। सुप्रीम कोर्ट के रवैये को देखते हुए सख्त कदम उठाए जाने का अनुमान भी लगाया जा रहा है। 94 हजार करोड़ रुपये की रकम कोई कम नहीं होती, खासकर तब, जब मंदी के कारण सरकारी संसाधनों पर काफी दबाव है। 

यहां टेलीकॉम कंपनियों के जिस बकाये की बात हो रही है, वह उस एडजस्टेड ग्रॉस रेवेन्यू की किस्त है, जिसका भुगतान टेलीकॉम कंपनियों को दिए गए लाइसेंस की शर्तों में ही शामिल था। हालांकि यह रकम कितनी हो, इसे लेकर कंपनियों और सरकार में काफी विवाद रहा है। सरकार का तर्क है कि इसका भुगतान कंपनियों को अपने पूरे राजस्व के आधार पर करना चाहिए, जबकि टेलीकॉम कंपनियों का कहना है कि इस तरह का आकलन गलत है और उनसे सिर्फ टेलीकॉम सेवा से होने वाले राजस्व के आधार पर ही रकम ली जानी चाहिए। यही मामला जब सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा, तो अदालत ने पिछले साल 24 अक्तूबर को दिए गए अपने निर्देश में टेलीकॉम कंपनियों से तीन महीने के भीतर ही यह रकम सरकारी खजाने में जमा कराने को कहा था। 

23 जनवरी को यह मियाद खत्म हो जाने के बाद भी रकम सरकारी खजाने में नहीं पहुंची। हालांकि इस समस्या को सिर्फ सरकार और कंपनियों के बीच एक विवाद की तरह नहीं देखा जा सकता। इस बीच इसमें एक और चीज जुड़ गई है, वह है टेलीकॉम कंपनियों पर मंडराता आर्थिक संकट। वैसे इस संकट की वजह लाइसेंस फीस की शर्तें नहीं हैं। इसका कारण टेलीकॉम कंपनियों की प्रतिस्पद्र्धा है, जिसके चलते वे बहुत कम दरों पर सेवाएं दे रही हैं। इसी संकट के चलते कुछ कंपनियों का दीवाला भी निकला है, कुछ बंद हुई हैं और कुछ ने विलय के जरिए अपने को बचाने की कोशिश की है। एकाध नई कंपनियों को छोड़ दें, तो सभी भारी घाटे में हैं। टेलीकॉम आधुनिक अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और इसे लंबे समय तक इस तरह नहीं चलाया जा सकता। इसलिए सरकार से यह उम्मीद भी बांधी जा रही है कि वह इस उद्योग को संकट से उबारने की कोशिश में कुछ करेगी। लेकिन यह सब सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की अवहेलना का तर्क नहीं बन सकता। 

  • Hindi News से जुड़े ताजा अपडेट के लिए हमें पर लाइक और पर फॉलो करें।
  • Web Title:hindustan editorial blog of 15 february