Hindustan editorial article on 31 october - फिर धुआं-धुआं आकाश DA Image

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फिर धुआं-धुआं आकाश

बार-बार कहा जाता है कि यह भारत के सतर्क होने का समय है, लेकिन हमने तो जैसे सतर्क होना ही छोड़ दिया है। यही कारण है कि दुनिया के 20 सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में से 14 भारत के हैं और इनमें भी सर्वाधिक खतरे वाला इलाका दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र है। यह भी तथ्य है कि भारत में हर साल महज प्रदूषण से लाखों मौतें होती हैं और यह भी कि दिल्ली का प्रदूषण इस बार अभी से तमाम मानकों के पार पहुंच गया है। हास्यास्पद कहें या चिंताजनक कि महज करवा चौथ की थोड़ी सी आतिशबाजी ने दिल्ली के धुएं में इतना इजाफा किया कि दिल्ली हांफने लगी, लेकिन पटाखों पर प्रतिबंध के नाम से बेचैन भी दिख रही है। 

दरअसल, प्रदूषण हमारे लिए अन्य तमाम मौसमी दुश्वारियों की तरह एक और दुश्वारी बनकर रह गया है, जिसकी चिंता भी हम बाकी दुश्वारियों की तरह नहीं करते। यह भारत में ही हो सकता है, जहां की व्यवस्थाएं इतनी गंभीर चेतावनियों के बाद भी न चेतें। जहरीली हवाओं से होने वाली मौतों के आंकड़ों में सबसे आगे निकल जाने की चेतावनी देती स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर 2017 की रिपोर्ट हो या अभी-अभी सामने आई विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट, ये बडे़ खतरे का इशारा कर रही हैं। सवाल है कि तमाम खतरों, चेतावनियों के बावजूद हमने इनसे निपटने की दीर्घकालिक रणनीति क्यों नहीं बनाई? वैसी रणनीति, जो नब्बे के दशक में दिल्ली ने सोची तो जरूर, लेकिन उसे दीर्घकालिक रूप न दे सकी। दिल्ली ऐसे ही भयावह प्रदूषण संकट से गुजर रही थी, जब 1993 में सीएनजी ने इसकी सांसों को बड़ी राहत दी। लेकिन इसके सुखद नतीजे देख दिल्ली हाथ पर हाथ धर बैठ गई और बहुत जल्द ही समस्या फिर वहीं पहुंच गई, जहां इसे विराम देने की कोशिश हुई थी। हमने समाधान तो निकाला, लेकिन हम दूरगामी सोच नहीं विकसित कर पाए, जबकि आबादी और वाहनों की रफ्तार को देखते हुए यह बहुत जरूरी था। 

सच यह है कि हमने दुश्वारियों के दीर्घकालिक समाधान तलाशना ही छोड़ दिया है। बाढ़ आने पर बाढ़ और सूखा आने पर सूखे की बात कर हम भूल जाते हैं। हम राजनीति के खांचे में सोचते, उसी में क्रिया-प्रतिक्रिया करते हैं। वरना कोई कारण नहीं कि लगातार बढ़ती गई इस समस्या का स्थाई समाधान न निकाल पाते और दिल्ली की हवा आज हमें कहीं और बस जाने को प्रेरित न करती। हमने अध्ययन दल के नाम पर नेताओं-अफसरों की फौजें तो विदेश भेजीं, लेकिन वहां भी यह देखने की जरूरत नहीं महसूस की कि जापान ने कैसे निर्माण तकनीक में क्रांतिकारी बदलाव किया कि बगल में हो रहा भवन निर्माण भी किसी को धूल कणों का शिकार नहीं होने देता। यह भी नहीं देखा कि वहां किस तरह सर्वाधिक ट्रैफिक वाले इलाकों में भी वाहनों की रफ्तार की राह आसान की गई और प्रदूषण थाम लिया गया, जबकि दिल्ली-मुंबई-बेंगलुरु जैसे हमारे अत्याधुनिक शहर आज भी सुबह-शाम दस-पंद्रह किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से रेंगते हैं और अपनी क्षमता से दोगुना-तिगुना कार्बन हवा में फेंकते हैं। आज जब फिर दिल्ली का आकाश धुआं-धुआं है, हम फिर से पटाखों और पराली की बात करने लगे हैं। लेकिन अब ऐसे स्थाई समाधान की जरूरत है, जो कुछ कारगर दिशा दिखा सके। यह हमारी ही लगाई आग है, जिसे स्थाई रूप से बुझाने के लिए दीर्घकालिक उपाय तलाशने होंगे। 

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  • Web Title:Hindustan editorial article on 31 october