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महानगर की आग

ये तो अच्छा हुआ कि दक्षिण दिल्ली के मालवीय नगर में लगी भीषण आग में कोई जनहानि नहीं हुई, लेकिन राष्ट्रीय राजधानी के इस घनी आबादी वाले इलाके में 20 घंटे तक आग के साथ चली फायर फाइटिंग टीम की लड़ाई कुछ बड़े सवाल जरूर छोड़ गई है। ये सवाल सुरक्षा मानकों की अनदेखी पर हैं, आग से लड़ने की हमारी क्षमताओं पर भी, महानगरीय विस्तार की आपाधापी में सुविधा-संरक्षा की स्थिति पर, तो अपने बीच आकार लेती मुसीबतों के प्रति नागरिक अनदेखी पर भी। गोदाम की आग पर काबू पाने में भले ही 20 घंटे लगे हों, लेकिन आग बुझाने में लापरवाही हुई हो, यह भी नहीं कहा सकता। रबड़ व केमिकल की आग यूं भी आसान नहीं होती। जिस आग को बुझाने में एयरफोर्स का हेलीकॉप्टर लगा रहा, अस्सी दमकल गाड़ियां रात भर जूझती रहीं, दस किलोमीटर दूर से पानी और मिट्टी भर-भरकर छिड़काव करने में कोताही न बरती गई हो, उसे लापरवाही तो नहीं कहा जा सकता। पर बड़ा सवाल यह जरूर है कि राष्ट्रीय राजधानी के इस घनी आबादी वाले इलाके में रबड़ और केमिकल जैसे ज्वलनशील पदार्थ का गोदाम चल कैसे रहा था और खतरनाक रबड़ से लदा ट्रक वहां क्यों खड़ा था? क्योंकि इस बात से इनकार का तो कोई कारण नहीं है कि ऐसे गोदाम या ठिकाने बिना स्थानीय प्रशासन की अनुमति या मिलीभगत के नहीं पनपा करते। 

विकास के नाम पर हमने बहुत कुछ किया, लेकिन मूलभूत सुविधाओं की अनदेखी हर जगह हुई। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली हो या मुंबई, बेंगलुरु और इनसे होड़ लेने में जुटे हमारे महानगर, कोई इससे बचा नहीं है। हम ऊंचे अपार्टमेंट बनाकर आकाश की ओर तो विस्तार लेते गए, मगर जमीन पर इतनी भी जगह नहीं छोड़ना चाहते कि जरूरत पड़ने पर अग्निशमन गाड़ियां बेधड़क अपना काम कर सकें। ऐसे-ऐसे अपार्टमेंट मिलेंगे, जहां ऊपरी मंजिल या पिछले हिस्से में आग लगने पर फायर टेंडर का पहुंचना लगभग अंसभव है। शहरों में अट्टालिकाओं की ऊंचाई के अनुपात में आग बुझाने वाली गाड़ियां तक नहीं हैं। भवनों में फायर फाइटिंग सिस्टम की जांच सालों-साल नहीं होती।

यूं भी इस मौसम में आग का खतरा बढ़ जाता है। जरा सी चिनगारी भयावह बन सकती है। हम मानकर बैठे हैं कि राष्ट्रीय राजधानी होने के कारण दिल्ली में सुविधाएं बहुत अच्छी होंगी। रख-रखाव और निगरानी तंत्र भी मजबूत होगा, लेकिन जब यहां यह हाल है, तो बाकी शहरों की कल्पना सहज ही की जा सकती है। यह खेतों और जंगल की आग का भी मौसम है। महानगरीय असुरक्षा बोध के बीच ग्रामीण इलाकों में सुरक्षा -संरक्षा की कल्पना ही की जा सकती है। दिल्ली अभी बवाना का हादसा भूली नहीं है, जिसमें पटाखों के गोदाम की आग ने 17 जानें ले ली थीं। पिछले साल मुंबई के रेस्टोरेंट की आग भी लापरवाही का ही नतीजा थी। ऐसे में, कुछ जिम्मेदारी स्थानीय नागरिकों की भी बनती है, जिनके सामने ये अवैध ठिकाने आकार लेते हैं और वे तब तक चिंता नहीं करते, जब तक कि ये उन्हीं के लिए मुसीबत न बन जाएं। उम्मीद है, अब जिन लोगों ने गोदाम के लिए प्रशासनिक अनदेखी को जिम्मेदार बताना शुरू किया है, वे अपने आसपास नजर डालेंगे और ऐसी गड़बड़ियों की ओर सबका ध्यानाकर्षण करेंगे। यह काम सबको करना होगा, क्योंकि संकट तो हर शहर में, हर इलाके में नए-नए रूप में आकार लेता रहता है।

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  • Web Title:Hindustan editorial article on 31 May