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अतीत का वर्तमान

कहते हैं कि कभी यह देश का सबसे भव्य बाजार था। पूर्णिमा की रात जब यहां चांदनी बिखरती, तो इसकी भव्यता को चार चांद लग जाते थे। शायद इसीलिए इसे नाम दिया गया था- चांदनी चौक। लेकिन मुगल शासक शाहजहां के जमाने में बना चांदनी चौक भले ही अपने बाजार के लिए, अपनी ऐतिहासिक दुकानों के लिए, अपनी इमारतों, कटरों और हवेलियों के लिए आज भी हमारे लिए महत्वपूर्ण हो, लेकिन इसके साथ ही यह भीड़ और ट्रैफिक जाम का पर्याय भी बन चुका है। ठीक वैसे ही जैसे देश के तमाम पुराने शहरों के ऐतिहासिक गली-कूचे और बाजार हैं। लेकिन इसी चांदनी चौक में अब एक नई कोशिश शुरू हो रही है, जो यदि कामयाब रही, तो देश के ऐसे पुराने शहरों के लिए एक नजीर बन सकती है। करीब डेढ़ किलोमीटर लंबे इस बाजार को अब सुबह नौ बजे से रात नौ बजे तक के लिए ऑटोमोबाइल मुक्त किया जा रहा है। वाहन के नाम पर इसकी सड़कों पर अब या तो रिक्शा चलेंगे या फिर बैटरी से चलने वाले ई-रिक्शा। इसके अलावा, हाथ से खींचे जाने वाले ठेलों को भी चलाने की इजाजत रहेगी।

आप चाहें तो इसे पुराने युग की वापसी भी कह सकते हैं। जब यह बाजार बना था, तब कार या ट्रक जैसे बड़े-बडे़ वाहन नहीं थे, इसलिए उस समय इस बाजार को जो इन्फ्रास्ट्रक्चर दिया गया, उसमें बडे़ वाहनों के लिए कोई जगह नहीं थी। हां, जानवरों खासकर घोड़ों के बांधने, उनके चारा खाने और पानी पीने के हौज जैसी व्यवस्थाएं जरूर थीं, जो समय के साथ ही खत्म हो गईं और अब शायद उनकी जरूरत कभी न पड़े। यह बताता है कि पूरी तरह उस पुराने युग में वापसी तो शायद कभी संभव नहीं होगी। चांदनी चौक एक ऐसा बाजार था, जिसने कभी दिल्ली को व्यापार की एक नई संस्कृति दी थी। और यही चांदनी चौक एक ऐसी जगह है, जिसने तीन सदी बाद भी अपनी प्रासंगिकता को बनाए रखा, एक विरासत के तौर पर ही नहीं, बल्कि एक जीवंत बाजार के रूप में भी। लोग यहां पुराने युग का अनुभव लेने के लिए ही नहीं जाते, बल्कि अपनी वर्तमान जरूरतों की खरीदारी के लिए भी जाते हैं। हमें यह ठीक से पता नहीं है कि शाहजहां के युग में जब यह बाजार अपने शैशव काल में था, तब यहां कितने लोग आते थे, लेकिन फिलहाल अनुमान यह है कि इस बाजार में रोजाना दो लाख से ज्यादा लोग आते हैं। डेढ़ किलोमीटर लंबा यह बाजार और उसकी गलियों में इतनी भीड़ आसानी से समा सकती है, लेकिन दिक्कत लोगों के साथ यहां आने वाले वाहनों और उसके धुएं से होती है। उम्मीद है कि ऐसी परेशानियां अब यहां नहीं फटकेंगी। बेशक, यहां के दुकानदारों और गली-कूचों में रहने वालों को इससे कई मुश्किलें होंगी। नई आदतें अपनी जगह बनाने में समय लेती ही हैं। 

चांदनी चौक में जो प्रयोग हो रहा है, उसमें कुछ नया नहीं है, दुनिया के कई पुराने शहरों ने इस तरह की व्यवस्थाओं को अपनाया है। उन्होंने इसके लिए हर तरह के विरोध और बाधाओं पर पार पाया है। लेकिन चांदनी चौक के प्रयोग पर देश भर की निगाहें रहेंगी। देश के कई ऐसे बाजार हैं, जो नए दौर के दबाव तले अपने पुराने वैभव को धीरे-धीरे खोते जा रहे हैं। यह ऐसे पुराने इलाकों की विरासत और भव्यता को बचाने का मामला तो है ही, साथ ही देश को अपनी विरासत सहेजने की एक नई संस्कृति देने के लिए भी जरूरी है। 
 

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  • Web Title:Hindustan editorial article on 31 august