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श्रीलंका में संकट

तख्ता पलट और उसके बाद हिंसा, श्रीलंका में रविवार देर रात सत्ता की लड़ाई में जिस तरह एक व्यक्ति को जान गंवानी पड़ी, उससे स्पष्ट हो गया कि एक नया राजनीतिक संकट इस देश के दरवाजे पर दस्तक दे चुका है। वैसे इस संकट की भूमिका तीन साल पहले तब ही लिख दी गई थी, जब चुनाव में किसी भी दल को बहुमत नहीं मिला था। यहां भारत में पिछले कई साल से हम जिस तरह गठबंधन सरकारों का शांतिपूर्ण आना-जाना देखते रहे हैं, श्रीलंका की राजनीति में वैसे बदलाव की उम्मीद कम ही है। यह ठीक है कि वहां कोई सैनिक या हथियारबंद विद्रोह नहीं हुआ, लेकिन जिस तरह से सरकार गिराने और बनाने के लिए संविधान के प्रावधानों का खुलेआम दुरुपयोग हुआ, वह चिंता पैदा करने वाला तो है ही, साथ ही श्रीलंका के लोकतंत्र की कमजोरी को भी दिखाता है। श्रीलंका का संविधान कहता है कि राष्ट्रपति अपनी मर्जी से किसी प्रधानमंत्री को पद से हटा नहीं सकता, मगर श्रीलंका के राष्ट्रपति मैत्रीपाला सीरीसेना ने रानिल विक्रमसिंघे के प्रधानमंत्री रहते हुए ही महिंदा राजपक्षे को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलवा दी। तर्क यह दिया गया कि संविधान के हिसाब से राष्ट्रपति अगर संसद में किसी व्यक्ति के पक्ष में बहुमत देखता है, तो वह उसे प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलवा सकता है। जवाब में विक्रमसिंघे ने बहुमत परीक्षण के लिए सदन का सत्र बुलवाया, तो उनकी इस कोशिश को निरस्त कर दिया गया। श्रीलंका से आने वाली तमाम खबरें यही बता रही हैं कि फिलहाल महिंदा राजपक्षे बहुमत जुटाने में लगे हैं, जो बताता है कि हकीकत में वह बहुमत से दूर हैं और बड़े पैमाने पर वहां दलबदल कराने की कोशिशें जारी हैं।

इस तरह की राजनीति में वैसे तो कोई नई बात नहीं और जहां-तहां वह तमाम देशों में दिख ही जाती है, लेकिन श्रीलंका की इस राजनीति में जिस तरह से चीन सक्रिय हुआ, उसने पूरी दुनिया को चौंका दिया है। महिंदा राजपक्षे के शपथ लेते ही जब चीन के कोलंबो स्थित चीनी राजदूत उन्हें बधाई देने पहुंच गए, तो अमेरिका समेत कई देशों की भृकुटियां तन गईं। इसके साथ ही ये अटकलें भी जोर पकड़ने लगीं कि इस तख्ता पलट में चीन की भूमिका है। यह भी कहा जाने लगा कि वहां दलबदल के लिए जो पैसा चाहिए, उसका इंतजाम चीन कर रहा है। इन अटकलों का सच समझना मुश्किल है, लेकिन यह सच है कि महिंदा राजपक्षे को काफी समय से चीन समर्थक माना जाता है। भारत के आस-पास के सभी देशों में अपना दबदबा बनाने की चीन की रणनीति श्रीलंका में मंहिदा राजपक्षे के कार्यकाल में ही परवान चढ़ी थी। यह भी कहा जाता है कि इसके कारण श्रीलंका बहुत बड़े आर्थिक संकट में फंस चुका है। रानिल विक्रमसिंघे ने सत्ता में आते ही इन्हीं नीतियों को पलटना शुरू कर दिया था और अंत में उन्हें सत्ता से हाथ धोना पड़ा। 

जब चीन नई सरकार के पक्ष में दिख रहा है, अमेरिका ने श्रीलंका से कहा है कि वह जल्द ही संसद की बैठक बुलाकर बहुमत का फैसला करे। भारत का आधिकारिक रुख भी इस मसले पर यही होगा। रानिल विक्रमसिंघे की छवि भी कोई भारत समर्थक नहीं थी, लेकिन उनके होने से भारत के लिए अच्छी बात यह थी कि वह श्रीलंका में चीन की रणनीति को ध्वस्त कर रहे थे। लेकिन फिलहाल इस सबसे जरूरी चीज यह है कि श्रीलंका में लोकतंत्र बना रहे और सब कुछ शांतिपूर्ण हो।

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  • Web Title:Hindustan editorial article on 30 october