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महंगाई भत्ते का बढ़ना

केंद्र सरकार के कर्मचारियों और पेंशनधारकों के लिए यह एक अच्छी खबर है कि उनका महंगाई भत्ता दो फीसदी बढ़ा दिया गया है। यह फायदा सिर्फ केंद्र सरकार के कर्मचारियों को ही नहीं, सार्वजनिक क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारियों को भी मिलेगा। केंद्र सरकार के कर्मचारियों का महंगाई भत्ता जब भी बढ़ता है, तो उसके साथ ही बहुत सारी हलचलें बढ़ने लगती हैं। केंद्रीय कर्मचारियों का महंगाई भत्ता बढ़ते ही राज्य सरकारों के कर्मचारी भी ऐसी ही मांग करने लगते हैं। कई जगह तो इसके लिए आंदोलन और हड़तालों का दौर भी शुरू हो जाता है और देर-सवेर राज्य सरकारों को उनकी मांग के आगे झुकना ही पड़ता है। हमारे देश में जिस तरह की लोक-लुभावन राजनीति और अर्थनीति चलती है, उसके कारण राज्यों के खजाने पर दबाव हमेशा ही बहुत ज्यादा होते हैं, इसलिए इस तरह के फैसले उनके संकट को बढ़ा देते हैं। यह मामला सिर्फ सरकारी कर्मचारियों तक ही सीमित नहीं रहता, इसके चलते निजी क्षेत्र और खासकर संगठित क्षेत्र पर भी वेतन वृद्धि के लिए दबाव बढ़ता है। वैसे अर्थशास्त्र में कर्मचारियों की वेतन वृद्धि को एक अच्छी चीज माना जाता है। वेतन बढ़ने का अर्थ होता है, खर्च करने लायक अधिक पैसे का आना। उम्मीद की जाती है कि बढ़ा हुआ पैसा जब बाजार में आएगा, तो वह बाजार के आकार को बढ़ाएगा। हालांकि व्यवहार में महंगाई भत्ता बाजार के आगे नहीं, पीछे चलता है। बीते दौर में बाजार में महंगाई बढ़ी है, उसका मुकाबला करने के लिए आगामी महीनों में वेतन में मामूली सी वृद्धि ही इस भत्ते का सार है, जो उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के फॉर्मूले से बनता है।  

महंगाई भत्ते की यह पंरपरा दूसरे विश्व युद्ध के समय शुरू की गई थी। वह ऐसा दौर था, जब युद्ध की वजह से महंगाई काफी तेजी से बढ़ रही थी और अंग्रेज सरकार के लिए कर्मचारियों और खासकर सेना में सेवा देने वालों का सहयोग बहुत जरूरी था। वेतन बढ़ाने का यह प्रावधान आजादी के बाद भी तरह-तरह से चलता रहा। इसके पीछे की धारणा यह है कि बढ़ती महंगाई के साथ ही अगर वेतन स्थिर बना रहता है, तो इसका अर्थ होगा, कर्मचारी की आमदनी का लगातार कम होते जाना। लेकिन इस भत्ते को वेतन वृद्धि की तरह नहीं, बल्कि बढ़ती महंगाई से सामंजस्य की तरह देखा जाता है। यह बात अलग है कि इससे कभी पूरी भरपाई नहीं होती, इसलिए सरकार को समय-समय पर वेतन आयोग बनाना पड़ता है, जिसकी अपनी एक अलग राजनीति होती है।

वैसे महंगाई भत्ते को भी राजनीति की नजर से ही देखा जाता है। अक्सर चुनाव से पहले कर्मचारियों का महंगाई भत्ता बढ़ाकर उन्हें खुश करने की कोशिश के तर्क सुनाई देते रहते हैं। इन बातों में भले ही ज्यादा सच्चाई नहीं होती हो, लेकिन पूरी प्रक्रिया इसकी जिस तरह की है, उसमें ऐसे आरोपों का आना अस्वाभाविक भी नहीं है। महंगाई भत्ते को उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के आधार पर ही बढ़ना है, तो एक निश्चित अवधि के बाद इस आधार पर उसकी गणना अपने आप हो जानी चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं होता। बुधवार को आई खबर बताती है कि भत्ता बढ़ाने का फैसला केंद्रीय मंत्रिमंडल ने अपनी बैठक में किया। यह ऐसी चीज नहीं होनी चाहिए, जिसके लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल को अपना अमूल्य समय बरबाद करना पड़े। अगर ऐसा होता रहा, तो राजनीति के आरोप भी आएंगे ही।

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  • Web Title:Hindustan editorial article on 30 august