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रोशनी की उम्मीद

परंपराओं में भी और पौराणिक आख्यानों में भी, दीपावली को हर जगह प्रकाश पर्व ही कहा गया है। ऐसा त्योहार, जब देश का हर घर-आंगन रोशन हो जाता है। लेकिन पता नहीं कब और कैसे दीपावली को पटाखों और आतिशबाजी का त्योहार बना दिया गया? अब हालत यह है कि पटाखों का कारोबार दीयों से ही नहीं, बिजली की लड़ियों के कारोबार से भी ज्यादा हो चुका है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने जब पटाखों के इस्तेमाल पर सीमा बांधी है, तो इसे इस रूप में भी देखा जाना चाहिए कि देश की सर्वोच्च अदालत ने हमें उस दौर में लौटने का मौका दिया है, जब दिवाली शोर और धुएं-धमाके का नहीं, रोशनी का त्योहार होती थी। वैसे यह मामला किसी तरह से पुरानी जड़ों की ओर लौटने का नहीं है, बल्कि इस धरती को बचाने का है। प्रदूषण और उसकी वजह से हो रहा पर्यावरण का बदलाव जिस तरह से हमारे और इस धरती के भविष्य को संकट में डाल रहा है, उसके बाद बहुत बड़े और सख्त कदम उठाने जरूरी हो गए हैं। बिना किसी दीपावली के ही जिस तरह से दिल्ली, उसके आस-पास और देश के कई महानगरों की हवा जहरीली हो चुकी है, उसके बाद तो हमें पटाखों के बारे में वैसे भी सोचना ही नहीं चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को इस लिहाज से स्वागतयोग्य तो कहा जा सकता है, लेकिन अच्छा यह होता कि इस मसले पर सुप्रीम कोर्ट जाने की नौबत ही न आती और यह काम समाज अपने आप कर लेता। क्योंकि बात किसी आदेश या नियम कायदे की नहीं, बल्कि हमारे स्वास्थ्य और अस्तित्व की है।

सुप्रीम कोर्ट ने दीपावली और नववर्ष के मौके पर पटाखे चलाने की न सिर्फ समय-सीमा बांधी है, बल्कि यह भी कहा है कि इन मौकों पर सिर्फ ऐसे पटाखे बाजार में बेचे जा सकेंगे, जिनसे होने वाले प्रदूषण का स्तर काफी कम होता है। विशेषज्ञों का कहना है कि अदालत ने कम प्रदूषण वाले पटाखों की जो शर्त लगाई है, उसके बाद बाजार में बिकने के लिए पहुंच चुके बहुत सारे पटाखों पर स्वत: पाबंदी लग जाएगी। जाहिर है, इससे पुलिस-प्रशासन की जिम्मेदारी बहुत बढ़ जाएगी, क्योंकि कारोबारी पाबंदी लग चुके इन पटाखों को भी किसी न किसी तरह खपाने के तरीके ढूंढें़गे। इस जिम्मेदारी का जिक्र इसलिए भी जरूरी है कि पटाखों को चलाने की समय-सीमा कोई पहली बार नहीं बांधी गई। हर बार इस समय-सीमा को खुलेआम या यूं कहें कि जोरदार धमाकों के साथ उल्लंघन होता रहा है।

ठीक इसी समय हमें एक दूसरे पक्ष पर भी ध्यान देना चाहिए। दीपावली एक बड़े स्तर पर रौनक का त्योहार है, जिसमें हर कोई अपने तरीके से योगदान देता रहा है। शायद पटाखों ने भी इसी रास्ते से दीपावली में अपने लिए जगह बनाई थी। हमें ऐसी वैकल्पिक व्यवस्थाएं करनी चाहिए कि अगले कुछ साल में पटाखों पर भले ही पूरी तरह से पाबंदी लग जाए, लेकिन दीपावली की रौनक लगातार बढ़ती जाए। सभी धर्मों, संप्रदायों और समुदायों को अब ऐसे तरीकों की ओर बढ़ना ही होगा, जिससे उनके त्योहारों की रौनक और उनकी सामुदायिक भावना लगातार बढ़े, लेकिन उनसे होने वाला कार्बन उत्सर्जन लगातार कम होता जाए। दुनिया के कई देशों ने अब विभिन्न अवसरों पर आतिशबाजी का प्रयोग कम किया है और उसकी जगह वे बड़े पैमाने पर लेजर शो जैसे आयोजन करने लगे हैं। हमें भी इसी ओर बढ़ना होगा।

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  • Web Title:Hindustan editorial article on 24 october