Hindustan editorial article on 23 october - साख पर सवाल DA Image
11 दिसंबर, 2019|10:21|IST

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साख पर सवाल

चर्चा और विवाद उसके लिए कोई नई चीज नहीं हैं, इन दोनों के बीच में कई बार उसका खासा मजाक भी उड़ता रहा है। देश की सर्वोच्च जांच एजेंसी केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी सीबीआई का नाम पिछली बार चर्चा में तब आया था, जब सुप्रीम कोर्ट ने उसे पिंजरे का तोता कहा था। यानी एक ऐसी संस्था, जो अपने मालिक के सुर में ही बोलती है। लेकिन अब जब सीबीआई के दो आला अफसरों में भिड़ंत होती दिख रही है, तो दिख रहा है कि तोते के कुछ अपने सुर भी हैं, जो एक-दूसरे के खिलाफ भिड़ते समय ही सुनाई देते हैं। पिछली बार सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने सीबीआई की विश्वसनीयता पर जो सवाल उठाए थे, नए विवाद ने उससे कहीं ज्यादा गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक तरफ सीबीआई ने अपने ही विशेष निदेशक के खिलाफ घूस लेने के गंभीर आरोप लगाते हुए बाकायदा रिपोर्ट दर्ज करा दी है, तो दूसरी तरफ आरोपी विशेष निदेशक सीबीआई निदेशक के खिलाफ घूस लेने के आरोप पहले ही लगा चुके हैं। दिलचस्प बात यह है कि घूस लेने के ये आरोप एक ही मामले में लगे हैं। अभी यह बता पाना मुश्किल है कि इन आरोपों में कितना सच है, कितना कीचड़ उछाल है और कितना पेशेवर लड़ाई का निकृष्ट स्तर पर पहुंच जाना है। पूरा सच तो हो सकता है कि आगे भी सामने न आ पाए, लेकिन मामला अगर जारी रहा, तो इस संस्था की बची-खुची विश्वसनीयता भी ध्वस्त होने की तरफ बढ़ चलेगी।

सुप्रीम कोर्ट ने जब सीबीआई को पिंजरे का तोता कहा था, तब एक ऐसा तथ्य सामने आया था, जिसे हर कोई पहले ही समझता था। देश में यह आम धारणा रही है कि सीबीआई सरकार की भाषा ही बोलती है। खासकर राजनीतिक मामलों में सरकार और सत्ताधारी दल के लोगों को बचाने की कोशिशें होती हैं, जबकि विरोधी दल वालों को फंसाया जाता है। सीबीआई सही अर्थों में स्वायत्त संस्था नहीं है, इसलिए इस पर हमें अक्सर हैरत नहीं होती। इस सच को जानते-समझते हुए हम यही उम्मीद करते रहे हैं कि आपराधिक मामलों में सीबीआई पेशेवर ढंग से जांच करती होगी और अपराधियों को कठघरे तक पहुंचाती होगी। कई मामलों में सीबीआई ने अपनी ऐसी क्षमता दिखाई भी है। हालांकि आपराधिक मामलों में सीबीआई के खाते में सफलता और असफलता, दोनों ही हैं, लेकिन ऐसे मामलों में हमारी आखिरी उम्मीद यही संस्था होती है। लेकिन ताजा विवाद ने हमारी इस धारणा को बुरी तरह क्षति पहुंचाई है। हमें नहीं पता कि किसने, कब, किसको, कितनी घूस दी, लेकिन मामला जिस स्तर पर और जिस तरह से चल रहा है, वह बता रहा है कि दाल में कुछ काला जरूर है। रिश्वत के ताजा आरोपों को सिर्फ दो आला अफसरों की आपसी लड़ाई का नतीजा बताकर ही खारिज नहीं किया जा सकता।

ऐसी संस्थाओं की दिक्कत यह होती है कि जब बुराइयों की दीमक उन्हें खोखला करने लगती हो, तब इस प्रक्रिया को रोकना आसान नहीं रह जाता। और यहां बात सिर्फ इस प्रक्रिया को रोकने की नहीं है। संस्था की विश्वसनीयता और प्रामाणिकता को बहाल करने की है। अभी जो मामला उभरा है, वह कुछ दिनों में दबा दिया जाएगा। मगर सिर्फ इतने से सीबीआई फिर से भरोसेमंद पेशेवर जांच एजेंसी नहीं बन जाएगी। इसके लिए अतिरिक्त प्रयास करने होंगे। यह मामला व्यापक पुलिस सुधार से भी जुड़ा है और पिंजरे के तोते को आजाद कराने से भी।

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  • Web Title:Hindustan editorial article on 23 october