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हताशा का आतंक

घाटी में सक्रिय आतंकवादियों का असली चरित्र अब सामने आ रहा है। कभी वे कश्मीरियत की बात करते थे। अब उनका नकाब उतर रहा है, जब वे कश्मीरियों को ही निशाना बना रहे हैं। यह हताशा का नतीजा है। उस हताशा का नतीजा, जहां वे चारो ओर से घिर चुके हैं और सुरक्षाबलों की कार्रवाई से बौखलाए हुए हैं। नतीजा यह कि अब उन्होंने पुलिसकर्मियों के परिवारों को निशाना बनाना शुरू कर दिया है। पुलिस वाले तो पहले से निशाने पर थे। घाटी के अलग-अलग स्थानों से आतंकवादियों ने कई लोगों को अगवा किया है, जिनमें ज्यादातर वरिष्ठ पुलिसकर्मियों के रिश्तेदार हैं। एक अपहरण पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती गृहनगर से भी हुआ है, जिसने राजनीति को गर्मा दिया है। हालांकि सेना ने अपहृतों की तलाश में जिस तरह का सघन सर्च अभियान छेड़ा है, जल्द ही किसी बड़ी कार्रवाई से इंकार नहीं किया जा सकता। 

इस पूरे प्रकरण में महबूबा मुफ्ती ने विवादास्पद बयान देकर माहौल को गरमा दिया है। उन्होंने आतंकवादियों और सुरक्षाबलों को एक ही कटघरे में खड़ा कर दिया है। महबूबा ने कहा कि ‘यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आतंकवादी और सुरक्षाबल दोनों अब बदले की कार्रवाई में एक दूसरे के परिवारों को निशाना बनाने लगे हैं।’ महबूबा का यह कहना कि किसी भी मामले में परिवारों को निशान नहीं बनाया जाना चाहिए, सही हो सकता है लेकिन ऐसे वक्त में जब आतंकवादी आतंक की नई परिभाषा गढ़ते हुए पुलिसवालों के परिजनों को निशाना बनाने लगें, यह अनर्गल प्रलाप है। राजनीति की भाषा में इसे दोनों पलड़े साधे रखने की जुगत कहा जाता है, लेकिन एक पलड़े पर जब आतंकी हों तो यह युक्ति उन्हीं के पक्ष में ज्यादा झुकती है। कहीं न कहीं यह उनके प्रति सदाशयता का प्रदर्शन भी है जो महबूबा की बातों में पहले भी गाहे-बगाहे दिखता रहा है। आपकी राजनीति जो कहे, आतंकियों और पुलिसवालों को एक ही खांचे से परखना न तो बुद्धिमत्ता कहा जा सकता है, न ही सुलझी हुई राजनीति का नमूना। सच तो यह है कि ऐसा बयान किसी भी खांचे में फिट नहीं बैठता। इसे सिर्फ गैर-जिम्मेदार कहकर भी नहीं टाला जा सकता। 

घाटी का आतंकवाद अब उस दौर में है जहां जल्द ही किसी निर्णायक कार्रवाई की जरूरत है। कश्मीर में अब तक अपनी-अपनी सुविधा की राजनीति ही हुई है। हालिया घटनाएं सिर्फ इसलिए महत्वपूर्ण नहीं हो गईं कि इनमें सुरक्षा बलों और पुलिस के परिवार निशाने पर आए हैं, बल्कि इसलिए भी कि यह सब पंचायत चुनाव पर सुरक्षाबलों की तैयारियों के बीच हुआ है। आतंकी संगठन कश्मीर में पंचायत चुनाव से पहले दहशत का कोई ऐसा मंजर दिखाना चाहते हैं, जिसकी गूंज दूर तक सुनाई दे। पुलिसवालों के रिश्तेदारों का अपहरण कर उन्होंने यही करने की कोशिश की है। लेकिन उन्हें शायद भारतीय सुरक्षा बलों की उस जीवट का अंदाजा नहीं है, जो धैर्य खत्म होने के बाद आकार लेती है। यह उस हताशा का नतीजा भी है जो आपरेशन ऑल आउट में आतंकी लीडरशिप के सफाए से आया है। सेना में पिछले दिनों हुई भर्ती के दौरान कश्मीरी युवाओं की भीड़ उमड़ने से भी वे घबराए हुए हैं। यही कारण था कि वे ईद में भी आतंक फैलाने से नहीं चूके, अब नई इबारत लिख रहे हैं। आतंक की यह नई इबारत महबूबा मुफ्ती को भी नजर आनी चाहिए। हर अमन पसंद कश्मीरी को भी।

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  • Web Title:Hindustan editorial article on 1st of september