Hindustan editorial article on 17 october - अब प्रयागराज DA Image
14 दिसंबर, 2019|10:43|IST

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अब प्रयागराज

महान लेखक शेक्सपियर का यह कथन अक्सर दोहराया जाता है कि नाम में क्या रखा है? लेकिन अपने देश में नाम सिर्फ नाम नहीं होता, इसके पीछे एक राजनीति होती है। इसलिए भारत में गलियों, सड़कों, मुहल्लों, शहरों और यहां तक कि प्रदेश का नाम बदलना कोई नई चीज नहीं है। हमारे यहां हर दौर और तकरीबन हर शासन में नाम बदले गए हैं। नाम बदलने का इतिहास काफी पुराना है, इसके विरोध और समर्थन के इतिहास की उम्र भी इतनी ही है। कभी कनॉट प्लेस राजीव चौक हो जाता है, गुड़गांव गुरुग्राम हो जाता है, तो कभी मुगलसराय दीन दयाल उपाध्याय नगर। इस सूची में अब एक और नाम जुड़ गया है इलाहाबाद। इलाहाबाद के नए नाम की घोषणा हो गई है, उत्तर प्रदेश के मंत्रिमंडल ने फैसला ले लिया है और कुछ समय में अधिसूचना जारी होने के बाद से उसे प्रयागराज के नाम से जाना जाएगा। फिर जल्द ही सरकारी कागजात, तमाम होर्डिंग, मील के पत्थरों, डाकखानों, बस अड्डों, निजी और सरकारी क्षेत्र के दफ्तरों और स्कूली पाठ्य-पुस्तकों में नाम बदलने की कष्ट साध्य प्रक्रिया शुरू होगी। वैसे यह कष्ट साध्य सिर्फ कहने भर का ही शब्द है, क्योंकि देश की नौकरशाही हो नाम बदलने की तमाम खानापूरी निपटाने की अब आदत सी पड़ गई है। स्कूली बच्चों ने भी इसी अपनी नियति मान लिया है। सामान्य ज्ञान की किताबों में एक सवाल और जुड़ जाएगा कि प्रयागराज शहर का पुराना नाम क्या था? हो सकता है कि कुछ समय बाद यह सवाल कौन बनेगा करोड़पति  जैसे टीवी कार्यक्रम की कमाई में भी अपनी भूमिका निभाए।

इलाहाबाद के लोगों के लिए इसका एक खास मतलब जरूर है। वे अपने उन्हीं पुराने घरों, दफ्तरों और दुकानों वगैरह में रहेंगे, लेकिन उनका पता बदल जाएगा। हालांकि इस तरह पता बदलने से बहुत कुछ नहीं भी बदलता, उन्हें अपने शहर की समस्याओं से अब भी पहले की तरह ही जूझना होगा। इलाहाबाद में कुछ समय बाद ही कुंभ होना था। लेकिन अब शायद यह प्रयागराज में होगा। नया नाम इस कुंभ को एक नई पृष्ठभूमि देगा- मुगलकालीन इलाहाबाद की बजाय वैदिक युग का प्रयागराज। इस लिहाज से देखें, तो शायद यह इलाहाबाद का नाम बदलने का सबसे उपयुक्त समय था।   

नाम बदलने पर आपत्ति नहीं हो सकती। कभी-कभी यह जरूरी भी हो सकता है। आपत्ति सिर्फ इस बात की है कि हमारे पास नाम रखने या नाम बदलने की कोई स्पष्ट नीति नहीं है। देश का हर शहर, हर कस्बा, हर मुहल्ला एक लंबे इतिहास से गुजरा है और इसी ऐतिहासिक प्रक्रिया में उसने अपने नाम को हासिल किया है। इसी नाम के इर्द-गिर्द हमारी बस्तियों और हमारे बाजार वगैरह ने अपनी सामाजिकता व मानसिकता हासिल की है। हम इतिहास को नहीं बदल सकते, सामाजिकता और मानसिकता को भी नहीं बदल पाते। बस नाम भर बदल देते हैं। कई बार नए नाम सिर्फ सरकारी सामग्री तक ही सीमित रह जाते हैं, प्रचलन में नहीं आते। पंजाब में एक जिला है रूपनगर। सरकारी कागजात पर यही नाम अंकित है। लेकिन हकीकत में कोई उसे इस नाम से नहीं जानता। वहां लोग जिस शहर में रहते, आते-जाते और जानते हैं, उसे वे रोपड़ कहते हैं। प्रयागराज के साथ शायद यह दिक्कत न आए, इलाहाबाद को इस नाम से भी संबोधित किया जाता रहा है। लेकिन नाम बदलने से पहले जरूरी यह है कि हम नाम की कोई स्पष्ट नीति बना लें। 

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  • Web Title:Hindustan editorial article on 17 october