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भीड़ हिंसा पर चेतावनी

भीड़ द्वारा किसी को पीट-पीटकर मार डालना सिर्फ और सिर्फ अपराध है। इस बात का कोई मतलब नहीं कि ऐसा क्यों और किन हालात में हुआ? यह भी कि यह सिर्फ और सिर्फ न्याय व्यवस्था का मामला है, जिसे सुनिश्चित करना राज्य का काम है। विडंबना है कि इन दोनों ही बातों पर सरकारों का ध्यान सुप्रीम कोर्ट बार-बार खींच रहा है, लेकिन राज्य सरकारें शायद कान में रूई डालकर बैठी हैं। कोर्ट के सख्त निर्देश के बावजूद तमाम राज्य सरकारों ने अभी तक उन गाइडलाइंस पर शायद नजर ही नहीं डाली है और यही कारण है कि 29 राज्यों और सात केंद्र शासित प्रदेशों में से महज 11 ही शीर्ष अदालत को अपनी सरकारों की पहल की जानकारी अब तक दे पाए हैं।

समाज में बढ़ती भीड़ हिंसा की घटनाओं पर शीर्ष अदालत ने अपने रुख का इजहार तभी कर दिया था, जब पहली बार यह मामला उसके सामने आया, लेकिन हीला-हवाली जारी रही, तो शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट को एक बार फिर सरकारों को आगाह करना पड़ा। उन्हें एहसास दिलाना पड़ा कि अपनी प्राथमिकताओं के मामले में वे कहां खड़े हैं। कोर्ट को मजबूर होकर अंतिम चेतावनी देनी पड़ी है कि राज्य अब भी अगर ऐसे मामलों में अपनी पहल की जानकारी एक सप्ताह के अंदर नहीं दे पाए, तो उनके गृह सचिवों को व्यक्तिगत तौर पर पेश होना होगा। हालांकि केंद्र सरकार ने कोर्ट को जरूर आश्वस्त किया कि अदालत के निर्देश के आलोक में वह भीड़ हत्या पर अलग से कानून बनाने को सचेष्ट है और इसके लिए ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स का गठन किया जा चुका है। अद्यतन जानकारी से शीर्ष अदालत को अवगत कराने में कुछ अन्य राज्यों के साथ उत्तर प्रदेश भी रहा, जिसने अदालत को आश्वस्त किया कि राज्य के सभी जिलों के पुलिस कप्तानों को नोडल अफसर बनाकर ऐसे मामलों की सख्त निगरानी तो की ही जा रही है, हिंसा फैलाने वालों और अफवाहबाजों पर नजर रखने के लिए टास्क फोर्स भी बनाई गई हैं।

सच तो यह है कि शुरुआती कुछ मामलों के बाद ही स्थिति की गंभीरता को देखते हुए यह खुद से जिम्मेदारी समझने और पहल करने का मामला था, जिसमें ज्यादातर राज्य फिसड्डी साबित हुए। कई बार तो पुलिस की मौजूदगी में ऐसी घटनाएं देखने में आईं, जहां वह असहाय दिखी दी या फिर मूकदर्शक। पहलू खां या रकबर खां की हत्याओं से उठे बवंडर से भी वह नहीं चेती, नतीजा घटनाएं भी नहीं थमीं। यूपी के इलाहाबाद में एक 70 वर्षीय रिटायर दारोगा की चंद लोगों द्वारा पीटकर हत्या भी इसी की ताजा कड़ी है, जो बताती है कि कारण और बहाने चाहे जो हों, मौका मिलते ही खुद को हिंसक भीड़ में तब्दील करने की प्रवृत्ति थमी नहीं है और इसे रोकने के लिए समूचे पुलिस तंत्र को सक्रिय होना होगा। यह सक्रियता सिर्फ दिखाने की नहीं, आश्वस्त करने की हद तक होनी चाहिए, जहां लोग मान सकें कि हां, वे वाकई सुरक्षित हैं, क्योंकि यह मानने में तो किसी को गुरेज नहीं होगा कि गो-रक्षा के नाम पर हो या किसी अन्य कारण से होने वाले ऐसे मामले, नागरिकों का जीवन बचाना राज्य का पहला दायित्व है और यह उसे निभाना ही होगा। पुलिस को घटना के बाद प्राथमिकी दर्ज करने मात्र की उस रवायत से बचना होगा, जिसके बाद अदालत में सुनना पड़ता है कि जब कोई इंसान अपनी जान से ही चला गया, तो फिर ऐसी प्राथमिकी का क्या अर्थ? 

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  • Web Title:Hindustan editorial article on 08 september