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समानता के लिए

समलैंगिकता अब भारत में अपराध नहीं रही। सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के ताजा फैसले के बाद तीन दशक से भी ज्यादा समय से चल रही वह कानूनी लड़ाई भी अब खत्म हो गई, जो कुछ लोगों के निजी जीवन के विकल्पों को अपराध के दायरे से बाहर रखने के लिए शुरू हुई थी। इसके साथ ही तकरीबन डेढ़ सौ साल पहले बना अंग्रेजी राज का वह कानून भी निपट गया, जो इस तरह के संबंधों को अप्राकृतिक मानता था, इसलिए अपराध के दायरे में रखता था। दिलचस्प बात यह है कि इस बीच ऐसी सारी चीजें अंग्रेजों के अपने देश में अपराध के दायरे से बाहर आ गईं, लेकिन हमारे यहां नए दौर की यह बयार दूर ही रही। सुप्रीम कोर्ट ने इसे न सिर्फ असांविधानिक माना है, बल्कि यह भी कहा है कि भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के लिए इतिहास को एलजीबीटी समुदाय से माफी मांगनी चाहिए। अदालत का यह भी कहना है कि कोई भी समुदाय चाहे वह कितना भी छोटा क्यों न हो उसे किसी स्थाई डर के साथ नहीं रहना चाहिए। इस धारा का समाप्त हो जाना इस समुदाय को अब अपराधी ठहरा दिए जाने के भय से मुक्त कर देगा। 

धारा 377 को खत्म किए जाने की मांग कोई नई नहीं है, काफी अरसे से समय-समय पर यह उठती रही है। इस पर चर्चा 2009 में उस समय तेज हुई, जब दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस धारा को खारिज कर दिया। यह लगभग तभी साफ हो गया था कि लोगों की जीवन शैली के आधार पर भेदभाव करने वाली इस धारा की उम्र बहुत लंबी नहीं है। इस फैसले की एक और खासियत यह थी कि इसने समाज में एक विमर्श शुरू किया, जो अलग तरह का जीवन जीने वालों को स्वीकार्य बनाने के लिए जरूरी होता है। बेशक इसके साथ ही इस धारा को सही मानने वाले भी सक्रिय हो गए। कुछ धार्मिक संगठनों और अन्य लोगों ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, जहां चार साल लंबी बहस के बाद यह तय हुआ कि इस धारा को समाप्त करना संसद का काम है और यह उसी को करना चाहिए। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने इसे लेकर संसद में एक निजी विधेयक भी पेश किया। इस बीच कुछ एलजीबीटी कार्यकर्ता सुप्रीम कोर्ट गए और इस संदर्भ में पुनर्विचार याचिकाएं पेश कीं। उनकी याचिकाएं संविधान पीठ के हवाले कर दी गईं, जिन पर सुनवाई के बाद मंगलवार को दिए गए फैसले में कहा गया कि लोगों की जीवन शैली उनके निजता और स्वतंत्रता का मामला है। 

समलैंगिकता को आपराधिक कृत्य मानने वाली मानसिकता पूरी दुनिया से काफी पहले ही विदा होनी शुरू हो गई थी। इस समय दुनिया के कुछ ही देश हैं, जहां इसे आपराधिक कृत्य माना जाता है। वे सारे देश कट्टरपंथी की श्रेणी में आते हैं। हम कभी नहीं चाहेंगे कि भारत की गिनती ऐसे देशों में हो। इस लिहाज से धारा 377 का हटना सिर्फ समलैंगिकता का मामला भर नहीं है, बल्कि भारतीय न्याय व्यवस्था को उन आधुनिक मूल्यों से जोड़ने का मामला भी है, जहां लोगों को निजी जीवन को किन्हीं मान्यताओं या धारणाओं की वजह से कठघरे में खड़े करने को गलत माना जाता है। वैसे धारा 377 ही नहीं, हमारे कानूनों में बहुत सी ऐसी धाराएं और प्रावधान हैं, जो प्रशासन और न्यायतंत्र के बोझ को बिना वजह बढ़ाते हैं। इन सबसे मुक्ति का समय अब आ गया है। न्याय व्यवस्था को सब तक पहुंचाने के लिए भी यह जरूरी है।

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  • Web Title:Hindustan editorial article on 07 september