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13 अगस्त, 2020|11:47|IST

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मौसम का ऑनलाइन जादू

मौसम हर चीज पर असर डालता है। हमारी फसलों पर, पेड़-पौधे, पशु-पक्षियों के अलावा नदी, पहाड़ और समुद्र, सभी पर। और हम पर तो इसका अनोखा असर होता ही है। हमारी सभी संस्कृतियां, हमारी सभी सभ्यताएं मौसम की जरूरतों और उसके दबावों के बीच ही बनी और बिगड़ी हैं। मौसम के साथ ही हमारा खान-पान, हमारे कपडे़ और यहां तक कि हमारे गीत-संगीत, सब बदल जाते हैं। मौसम के हिसाब से ही हमारे त्योहार भी होते हैं और हमारी सामाजिकता के अवसर भी। हमारी अर्थव्यवस्था और कई तरह से हमारे अस्तित्व का मूल आधार तो खैर मौसम होता ही है। अक्सर यह हमारी खुशियों और कई बार हमारे दुखों का कारण भी बनता है। मौसम से इंसान के रिश्ते की यह कविता हर उस जगह पहुंच जाती है, जहां इंसान जाता है। शोधकर्ताओं ने इसे सोशल मीडिया पर भी ढूंढ़ डाला है। जी नहीं, यहां हम उन बधाई संदेशों या उन तस्वीरों का जिक्र नहीं कर रहे, जो आपको हर नए मौसम में सोशल मीडिया पर दिख जाते हैं। इसके अलावा भी बहुत कुछ है, जो मौसम के हिसाब से सोशल मीडिया पर बदलता है। लेकिन अक्सर यह इतना सूक्ष्म होता है कि हम पकड़ नहीं पाते।

प्लॉस वन  नाम की एक शोध पत्रिका में छपे शोध के अनुसार, अगर आप ध्यान से देखें, तो मौसम के बदलाव को आसानी से फेसबुक और ट्विटर पर पढ़ सकते हैं। शोध में पाया गया कि अगर मौसम अच्छा हो, तो उस दिन लोग सोशल मीडिया पर खुशिया बिखेरते हैं। लेकिन मौसम अगर अच्छा नहीं है, नमी ज्यादा है या कोहरा छाया है, तो बहुत से लोगों की पोस्ट में निराशा झलकने लगती है। और अगर तापमान 20 डिग्री सेल्शियस से ज्यादा बढ़ने लगे, तो लोगों की पोस्ट में सकारात्मकता कम होने लगती है और नकारात्मकता बढ़ती हुई दिखती है। ऐसा सिर्फ पोस्ट में ही नहीं होता, लोगों की लाइक और टिप्पणियों में भी यह दिखता है। शोधकर्ताओं ने पाया कि तापमान, बारिश, बादल कोहरा और आंधी वगैरह लोगों के मूड को बदल देते हैं और उनका यही मिजाज सोशल मीडिया पर झलकने लगता है। हालांकि मौसम और मूड की यह अवधारणा देश और भूगोल के हिसाब से बदलती है। पश्चिम के ठंडे देशों में जिस दिन सूरज पूरी तरह खिलता है, उसे अच्छा दिन माना जाता है। जबकि भारत जैसे देशों में मई-जून के सूरज का कुछ और ही अर्थ होता है। इसी शोध पत्रिका में प्रकाशित एक अन्य अध्ययन के अनुसार, किसी वयस्क का सोशल मीडिया पर व्यवहार देखकर हम उसकी मन:स्थिति का सही आकलन कर सकते हैं। दोनों शोध एक तरह से यही बताते हैं कि सोशल मीडिया पर जो व्यक्त होता है, वह हमारा भीतरी एहसास ही होता है।

लेकिन बहुत से सवाल अब भी ऐसे हैं, जो अनुत्तरित हैं। मसलन, जितनी नफरत हमें समाज में नहीं दिखती, उतनी हमें सोशल मीडिया पर क्यों दिखती है? आम जीवन में प्यार और भाईचारे की बात करने वाले क्यों कभी-कभी सोशल मीडिया पर दंगे और हिंसा की भाषा का प्रयोग करते दिख जाते हैं। अपने रोजमर्रा के जीवन में हम भले ही अफवाहों से खुद को बचा लें, लेकिन ऐसा क्या होता है कि सोशल मीडिया पर हम कभी न कभी इसकी चपेट में आ ही जाते हैं। हमारी ऑनलाइन मानसिकता और ऑफलाइन मानसिकता में इतना फर्क क्यों है, इस पर शोध बहुत जरूरी है।

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  • Web Title:Hindustan editorial article on 07 May