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मेट्रो किराये का भार

दिल्ली ने इसे सुखद भविष्य के आश्वासन की तरह अपनाया था और पूरे देश ने इसे एक बड़ी उम्मीद की तरह देखा था। दिल्ली मेट्रो ने देश के तमाम बड़े शहरों को आधुनिक सार्वजनिक परिवहन अपनाने की प्रेरणा दी। कई जगह ऐसी शहरी रेल सुविधा लोगों को मिलने भी लगी है, कई जगह इसे अंतिम रूप दिया जा रहा है, तो कई जगह इसकी योजना तैयार है। जिन शहरों और कस्बों में यह सब कुछ नहीं हुआ, वहां भी लोगों के लिए यह एक हसरत है। लेकिन इस बीच कहानी बदल रही है। ताजा आंकडे़ बता रहे हैं कि दिल्ली मेट्रो को जितने यात्री मिलने की उम्मीद थी, उतने उसे नहीं मिल रहे। उम्मीद थी कि हर रोज तकरीबन 40 लाख लोग इसमें यात्रा करेंगे, लेकिन यह आंकड़ा अभी 27 लाख के आस-पास ही है। यह उम्मीद की जा सकती है कि यात्रियों की संख्या निकट भविष्य में बढे़गी, लेकिन शायद ऐसा भी नहीं है, क्योंकि इस साल इसके यात्रियों की संख्या 4.2 लाख कम हो गई है। यात्रियों की संख्या कम होने का कारण बताया गया है, इसके किराये का बहुत ज्यादा बढ़ जाना। सेंटर फॉर साइंस ऐंड एनवायर्नमेंट ने इसके लिए जो आंकडे़ पेश किए हैं, वे चौंकाने वाले तो हैं ही, उनसे सार्वजनिक परिवहन पर एक नई बहस शुरू हो सकती है।

सेंटर का अध्ययन बताता है कि अगर आबादी या यात्रियों की आर्थिक स्थिति के लिहाज से देखा जाए, तो दिल्ली मेट्रो दुनिया की दूसरी सबसे महंगी सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था हो गई है। अध्ययन बता रहा है कि दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के लोग अपनी आमदनी का 19.5 फीसदी हिस्सा परिवहन पर खर्च कर रहे हैं, जबकि आदर्श स्थिति में उन्हें इस पर 15 फीसदी से ज्यादा धन नहीं व्यय करना चाहिए। और न्यूनतम मजदूरी पर काम करने वाले श्रमिकों के लिए तो यह खर्च 22 फीसदी तक है। यह बताता है कि दिल्ली की मेट्रो सुविधाओं के मामले में भले ही सबसे बेहतर हो, लेकिन वह यहां की आम आबादी के आर्थिक बोझ को बढ़ा भी रही है। अगर यात्रियों की आर्थिक स्थिति के लिहाज से दिल्ली मेट्रो दुनिया की दूसरी सबसे महंगी सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था है, तो पहला नंबर किसका है? पहला नंबर है वियतनाम की राजधानी हनोई की सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था का। भारत और वियतनाम, दोनों ही तेजी से बढ़ती हुई विकासशील अर्थव्यवस्थाएं हैं। दोनों में ही निम्न आय वर्ग के लोगों की संख्या बहुत बड़ी है। संसाधन के हिसाब से दोनों ही शायद इतनी बड़ी अर्थव्यवस्थाएं नहीं हैं कि सार्वजनिक परिवहन पर भारी सब्सिडी दे सकें।

किराया बढ़ाते समय तर्क दिया गया था कि सुविधाओं के लिहाज से यह बहुत ज्यादा नहीं है। तुलनात्मक रूप से देखें, तो इस तर्क में दम भी है। दूसरा यह कि अंत में दिल्ली मेट्रो को आत्मनिर्भर बनना ही होगा। एक सच यह भी है कि विकसित देशों समेत दुनिया की ज्यादातर जगहों पर शहरी सार्वजनिक परिवहन संस्थाएं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं हैं। सच यह भी है कि ऐसी परिवहन व्यवस्थाओं का उद्देश्य आर्थिक आत्मनिर्भरता होता भी नहीं। उनका मकसद शहर को जाम और प्रदूषण से मुक्ति दिलाने के अलावा आबादी की उत्पादकता बढ़ाना होता है। लेकिन यही लोग अगर अपनी आमदनी का ज्यादा हिस्सा परिवहन पर खर्च करेंगे, तो अपने जीवन पर खर्च करने के लिए उनके पास कम धन बचेगा, जो अंत में अर्थव्यवस्था को ही कमजोर करेगा।

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  • Web Title:Hindustan editorial article on 06 september