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वीजा नीति का उलट वार

जिस एच1बी वीजा नियमों में बदलाव से अमेरिका अपनी बेरोजगारी का समाधान ढूंढ़ना चाह रहा है, वही नियम उसकी जिद बनकर उसकी समस्या लगातार बढ़ाते जा रहे हैं। अभी हाल ही में करीब पांच दर्जन बड़ी अमेरिकी कंपनियों के सीईओ ने वीजा नियमों में बदलाव के खिलाफ डोनाल्ड ट्रंप को पत्र लिखकर चिंता जताई थी और आगाह किया था कि ऐसा कुछ नहीं होना चाहिए, जिससे अमेरिका में रह रहे हजारों विदेशी कुशल कर्मचारियों को परेशानी तो हो ही, साथ ही यह बदलाव कहीं अमेरिका की आर्थिक रफ्तार को ही कमजोर न कर दे। अमेरिकी कंपनियों ने अब एक बार फिर ट्रंप प्रशासन को खतरे से आगाह करते हुए इस नीति पर दोबारा नजर डालने को कहा है। दरअसल, डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्रपति बनने के बाद ‘अमेरिकन फस्र्ट’ की जो नीति अपनाई थी, तब सोचा गया था कि शायद जल्द ही वह इसकी खामियों को समझकर कुछ बदलाव करेंगे, लेकिन बदलाव तो नहीं आना था सो नहीं आया, उल्टे यह उनकी जिद बनता गया। 

यह अमेरिकी कंपनियों में ट्रंप के प्रति बढ़ती नाराजगी ही है कि अब उन्होंने इस खतरे के प्रति नए सिरे से आगाह किया है। यह अलग बात है कि ट्रंप इस सच को या तो समझ नहीं पा रहे, या समझना नहीं चाह रहे। एक ताजा रिपोर्ट तो यह भी कहती है कि अमेरिका विदेशी श्रम का प्रवाह रोकने के लिए नई बाधाएं तैयार कर रहा है और यदि ऐसा हुआ, तो इसका सबसे बड़ा और सीधा असर भर्ती पर पड़ेगा। कंपनियां भी मान रही हैं कि ताजा नीतियों के बाद जैसी शर्तें थोपी जा रही हैं, वह वीजा जारी करने की प्रक्रिया में सीधे इनकार न करके उसे लगातार टालते रहने जैसा है। इसके कारण अमेरिकी अस्पतालों, होटलों, प्रौद्योगिकी कंपनियों के साथ ही तमाम अन्य व्यवसाय खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। उनके सामने वर्क फोर्स का संकट गहराने लगा है। कंपनियों की बड़ी चिंता इस बात को लेकर भी है कि इस तरह तो दीर्घअवधि में वे प्रतिभाशाली इंजीनियरों और प्रोग्रामरों की अच्छी खासी फौज से वंचित हो जाएंगी। 

नेशनल फाउंडेशन ऑफ अमेरिकन पॉलिसी की ही मानें, तो कुशल श्रम की गारंटी देने वाले एच1बी वीजा के लिए आवेदनों से इनकार के मामलों में वित्त वर्ष 2017 की अपेक्षा पिछले तीन महीनों में 41 प्रतिशत वृद्धि आई है। हालांकि भारत इस पर गंभीर है और उम्मीद है कि दिल्ली में दो दिन बाद हो रही भारत-अमेरिका 2+2 डायलॉग में यह मुद्दा गंभीरता से उठेगा। सच तो यह है कि अमेरिकी राष्ट्रपति जिद भले ही दिखा लें, उन्हें याद रखना होगा कि अमेरिका की यह नीति आज भले भारतीयों को दिक्कत तलब लग रही हो, दीर्घअवधि में यह अमेरिका के लिए ही घाटे का सौदा साबित होगी, जब उसकी अपनी कंपनियां विदेशों में अपने केंद्र खोलने को मजबूर होंगी, जो अमेरिका में बेरोजगारी बढ़ाने वाला साबित होगा। भारत की आईटी मेधा तो जिस तरह आज अमेरिका में रहकर काम कर रही है, वह दिन दूर नहीं, जब कोई और देश उसके लिए दरवाजे खोल देगा। यानी वह समय भी आ सकता है, जब भारतीय मेधा की मांग कई और देशों में तो बढ़ेगी ही, हमारी अपनी धरती पर भी उसके लिए नए द्वार खुलेंगे। यह भी उतना ही तय है कि अमेरिका को एक दिन अपनी इस नीति पर पुनर्विचार करना होगा, लेकिन तब तक शायद देर हो चुकी होगी।

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  • Web Title:Hindustan editorial article on 05 september