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नई किताबें

उन्हें समय का सबसे अच्छा दस्तावेज माना जाता है। लेकिन किताबें कोई जड़ दस्तावेज नहीं होतीं। हमेशा से वे समय के साथ बदलती रही हैं। एक जमाना ताड़पत्रों और ताम्रपत्रों की किताबों का था। उनके आकार की सीमाएं थीं, प्राकृतिक कारणों से भी और तकनीकी कारणों से भी। फिर आया कागज का जमाना, तो ये बंधन काफी कुछ टूट गए। अब किसी भी आकार-प्रकार और मोटाई की किताब छापना संभव हो गया था। पर ऐसा नहीं है कि हर आकार की किताबें बाजार में आ गईं। किताबों के आकार के कुछ मानक बने। जैसे स्क्वॉयर, डिमाई, डाइजेस्ट वगैरह। हर जरूरत के लिए एक अलग आकार बना। विश्वकोश के लिए अलग मानक था, शब्दकोश के लिए अलग, तो कविता की किताब के लिए अलग। याद कीजिए उस रामायण का आकार, जिसे आपकी दादी मां पढ़ती थीं और उस किताब का आकार, जिससे आपने कक्षा आठ के गणित के सबक सीखे थे। दोनों के ही आकर अलग थे। हर आकार की किताब बनाना संभव था, लेकिन हर आकर की किताबें बाजार में आईं नहीं। एक तो इसलिए कि इनका आकार बहुत कुछ छापने की मशीनों से तय होने लगा और बहुत कुछ इससे कि किस आकार की किताब छापना सस्ता पड़ेगा। यानी यह आकार तकनीक और अर्थशास्त्र से तय हो रहा था। कुछ हद तक यह बाजार की जरूरत से भी तय हुआ। जब काम और जरूरतों के लिहाज से लोगों का आवागमन बढ़ा, तो पॉकेट बुक्स का चलन बढ़ गया, यानी ऐसी किताबें, जो आसानी से कोट की जेब में रखी जा सकें। 21वीं सदी में ये किताबें एक बार फिर अपना आकार बदल रही हैं।

एक अरसे से पूरा किताब उद्योग स्मार्टफोन के आगमन को लेकर चिंतित है। स्मार्टफोन ने हमारी जिंदगी में इस कदर घुसपैठ की है कि लोगों के पास किताब जैसी चीज के लिए वक्त ही नहीं बचा। पत्रिकाओं की स्थिति तो और खराब है। किताब के प्रकाशकों ने इसका मुकाबला करने के लिए दो तरह की रणनीति अपनानी शुरू की है। एक तो उन्होंने ऐसी किताबें प्रकाशित करनी शुरू कर दी हैं, जो स्मार्टफोन पर ही पढ़ी जा सकें। हालांकि अभी इन किताबों का चलन इतना भी नहीं बढ़ा कि इस दौर को स्मार्टफोन बुक्स का युग घोषित किया जा सके। इसके साथ ही ई-बुक्स का चलन भी शुरू हुआ है, लेकिन उनके भविष्य के बारे में भी अभी पक्के तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता। इस बीच कागज की किताबों के नए प्रयोग शुरू हो गए हैं। पेंग्विन जैसे बडे़ प्रकाशकों समेत कई प्रकाशक अब बहुत छोटे आकार की किताबें छापने की तैयारी कर रहे हैं। लगभग उसी आकार का, जिस आकर का स्मार्टफोन होता है। माना जा रहा है कि यह नई पीढ़ी का सर्वस्वीकृत आकार है। इस आकार की किताबें उसमें ज्यादा लोकप्रिय हो सकती हैं।

चुनौती सिर्फ आकार की नहीं है। चुनौती है कि स्मार्टफोन में रम गई पीढ़ी के हाथों में कागज की किताबें कैसे पकड़ाई जाएं? यह गारंटी नहीं है कि छोटे आकार की किताबें उन्हें मोबाइल की सतरंगी दुनिया से विमुख कर सकेंगी। यह तेज बदलाव का दौर है और किताबों का या आने वाली पीढ़ियों में ज्ञान अर्जन व साहित्य का रूप क्या होगा, हम नहीं जानते। किताबों का आकार घटने से उम्मीद बांधने के अलावा हमारे पास कोई और चारा भी नहीं है।

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  • Web Title:Hindustan editorial article on 05 November