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आतंक और मदद

हर दो-तीन महीने में ऐसी खबर आ ही जाती है। अमेरिका पाकिस्तान को दी जाने वाली मदद बंद करने जा रहा है- इस खबर को हम पिछले कुछ साल में इतनी बार सुन चुके हैं कि अब इस पर सहज ही विश्वास नहीं होता। लेकिन इस बार वाशिंगटन से जो खबर आई है, उसमें गंभीरता ज्यादा है। एक तो यह खबर अमेरिकी सरकार के किसी सचिव या किसी संसदीय समिति के किसी सदस्य के बयान पर आधारित नहीं है। इस बार यह बात सीधे अमेरिका के रक्षा विभाग, पेंटागन ने कही है। पेंटागन का कहना है कि अमेरिका पाकिस्तान को ‘कॉलिशन सपोर्ट फंड’ के नाम से दी जाने वाली तीन हजार करोड़ डॉलर की मदद रोक रहा है। यह मदद 2002 में शुरू की गई थी, जब अमेरिकी फौज ने तालिबान के खिलाफ लड़ाई के लिए अफगानिस्तान पर हल्ला बोला था। तब लड़ाई के लिए अमेरिका ने पाकिस्तान को ही अपना आधार बनाया था। इस मदद के पीछे की सोच थी, लड़ाई में सहयोग के लिए पाकिस्तान के प्रयासों के लिए उसे भुगतान करना। अब पेंटागन ने तर्क दिया है कि यदि पाकिस्तान को यह मदद चाहिए, तो उसे बिना किसी भेदभाव के सभी तरह के आतंकवादियों और आतंकी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई करनी होगी। अभी तक पाकिस्तान अच्छे तालिबान और बुरे तालिबान का वर्गीकरण तो करता ही है, साथ ही भारत के खिलाफ सक्रिय आतंकियों को स्वतंत्रता सेनानी बताकर उन्हें मदद भी पहुंचाता है। पिछले कुछ बरस में अमेरिका ने यह सीखा है कि इन सभी तरह के आतंकवादी अंत में उसके हितों के खिलाफ ही काम करते हैं।

यहां एक महत्वपूर्ण बात यह है कि मदद बंद करने की बात तब कही गई है, जब अमेरिका के विदेश सचिव माइक पोम्पियो पाकिस्तान के दौरे पर जाने वाले हैं। इन दोनों चीजों का संयोग एक साथ जुड़ने से इस्लामाबाद में यह अनुमान लगाया जा रहा है कि मदद रोकने की घोषणा इसलिए की गई है, ताकि अमेरिकी विदेश सचिव पाकिस्तान पहुंचकर वहां कड़ी सौदेबाजी कर सकें। पाकिस्तानी अखबारों में बार-बार इस तथ्य की ओर ध्यान भी दिलाया जा रहा है कि पाकिस्तान को जो मदद रोकने की घोषणा की गई है, अमेरिका में उसका बजट प्रावधान पहले ही किया जा चुका है। हमें नहीं मालूम कि इस बार अमेरिका कितना गंभीर है, लेकिन पाकिस्तान आश्वस्त दिख रहा है कि थोड़ी बहुत सौदेबाजी के बाद मदद फिर से उसके खाते में दर्ज हो जाएगी। अमेरिका ने मदद रोकने की यह बात तब कही है, जब पाकिस्तान गहरे आर्थिक संकट में फंसा हुआ है और किसी भी तरह की मदद रुकने का अर्थ है, उसके संकट का गहराना।

पेंटागन ने पाकिस्तान के रवैये को लेकर जो कुछ कहा है, उसमें कुछ भी नया नहीं है। यह बात भारत न जाने कब से कह रहा है। कई अमेरिकी थिंक टैंक समय-समय पर भारत के इस तर्क को स्वीकार भी करते रहे हैं, लेकिन यह अमेरिका की नीतियों में कभी जगह नहीं बना सका है। यह समझना जरूरी है कि आतंकवाद पर इस्लामाबाद के तमाम घपलों-घोटालों के बावजूद तालिबान के खिलाफ लड़ाई में अमेरिका को पाकिस्तान की अभी भी जरूरत है। इसलिए पाकिस्तान को मिलने वाली अमेरिकी मदद पूरी बंद होगी, इसकी संभावना ज्यादा नहीं है। लेकिन एक सच यह भी है कि पाकिस्तान की प्रवृत्तियों पर लगाम लगाए बिना अमेरिका आतंकवाद के खिलाफ जंग कभी पूरी तरह नहीं जीत सकेगा।

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  • Web Title:Hindustan editorial article on 04 September