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हरारत की माप-जोख

मापना सभ्य इंसान की पुरानी फितरत का हिस्सा रहा है। दुनिया भर के सभ्य समाजों ने अपने-अपने ढंग से समय को, दूरी को, गति को, आकार को, क्षेत्रफल को नापने के पैमाने विकसित किए हैं। फिर एक ऐसा दौर आया, जब हर चीज को ही नापा जाने लगा- सर्दी को, गरमी को, सुख को, दुख को, अर्थव्यवस्था को, महंगाई को और यहां तक कि अक्ल को भी। इसी के साथ डेढ़ सौ साल पहले एक और पैमाना विकसित हुआ, इंसान के बुखार का मापने का। यह तो इंसान बहुत पहले से ही जानता था कि अगर बुखार हो, तो शरीर का तापमान बढ़ जाता है। जितना ज्यादा बुखार, उतना ही बढ़ा हुआ तापमान। कार्ल वंडरलिच ने शरीर के इस तापमान को समझने के लिए लंबा शोध किया और वह इस नतीजे पर पहुंचे कि 98.6 डिग्री फॉरेनहाइट शरीर का सामान्य तापमान है, शरीर का तापमान अगर इससे ज्यादा हो, तो इसका अर्थ है बुखार। 1868 में जब उनका यह शोध प्रकाशित हुआ, तो यही तापमान चिकित्सा व्यवसाय का मानक बन गया। सर्दी-गरमी को मापने वाले थर्मामीटर तब तक विकसित हो ही चुके थे, इन्हीं में थोड़ा सा बदलाव करके शरीर का तापमान मापने वाले थर्मामीटर भी जल्द ही बाजार में आ गए,जो जल्द ही चिकित्सा का एक जरूरी उपकरण बन गए। डॉक्टरों और अस्पतालों में इस्तेमाल होने के साथ ही वह घर-घर पहुंच गए। बात सिर्फ शरीर के तापमान तक सीमित नहीं रही, 98.6 का आंकड़ा जल्द ही एक मुहावरा बनकर समाज और संस्कृति के कई क्षेत्रों में इस्तेमाल होने लगा। इसी नाम से एक गीत बना, एक उपन्यास लिखा गया, एक सर्वाइवल गाइड आई और दुनिया के कई देशों में एफएम चैनल खुले। पर अब 98.6 के इस आंकडे़ पर ही सवाल खड़े होने लगे हैं।

बोस्टन चिल्ड्रन हॉस्पिटल के जोनाथन हुसनैन ने पिछले दिनों इस पर लंबा शोध किया, तो वह इस नतीजे पर पहुंचे कि मानव शरीर के सामान्य तापमान के लिए 98.6 का आंकड़ा मूल रूप से गलत है। उन्होंने पाया कि हमारे शरीर का तापमान सुबह के वक्त थोड़ा कम होता है और शाम तक थोड़ा सा बढ़ जाता है। इसके अलावा पुरुषों के मुकाबले महिलाओं के शरीर का तापमान मामूली सा ज्यादा होता है। बड़ों के मुकाबले बच्चों का थोड़ा सा ज्यादा होता है। फिर अलग-अलग तरह के लोगों के शरीर का सामान्य तापमान अलग-अलग होता है, यानी पूरे मानव समुदाय के लिए 98.6 डिग्री फॉरेनहाइट का मानक सही नहीं है। वह इस नतीजे पर पहुंचे कि शरीर का सामान्य तापमान और बुखार, दोनों ही जटिल चीजें हैं, एक आंकड़े के सरलीकरण से इसे नहीं समझा जा सकता। 

जो चीज बुखार के बारे में सही है, वह बहुत सी दूसरी चीजों के बारे में भी शायद सही ही है। मसलन, हम महंगाई या मुद्रास्फीति के आंकड़े को ही लें। यह बात अक्सर कही जाती है कि मुद्रास्फीति के आंकडे़ जो तस्वीर पेश करते हैं और लोग जो अपनी दिन-प्रतिदिन की जिंदगी में महसूस करते हैं, उसमें अक्सर बड़ा अंतर होता है। अक्ल के नापने के लिए बने आईक्यू के पैमाने को तो अब मनोविज्ञान तक ने नकार दिया है। सच तो यह है कि सटीक पैमाने सिर्फ भौतिक चीजों और प्रक्रियाओं के ही बनते हैं। सामाजिक और शारीरिक प्रक्रियाओं के पैमाने सिर्फ सांकेतिक होते हैं, इनसे उनके उतार-चढ़ाव की थाह भर पाई जा सकती है। दिक्कत तो तब आती है, जब हम इसे जड़ मानक मान लेते हैं। 

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  • Web Title:Hindustan editorial article on 03 September