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5 जून, 2020|2:00|IST

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नई रणनीति की जरूरत

जम्मू-कश्मीर में आतंकियों ने श्रीनगर एयरपोर्ट के पास बीएसएफ की 182वीं बटालियन के कैंप पर जिस तरह हमला किया, वह हमारे सुरक्षा बलों की ‘आत्मरक्षा तैयारियों’ पर सवाल उठाता है। यह सवाल उन सुरक्षा बलों के अपने शिविरों-ठिकानों की सुरक्षा सिस्टम पर है, जो सीमा पार और सीमा के अंदर से भी हर खतरे से निपटने के लिए बार-बार खुद को जोखिम में डालते हैं और सफल होकर लौटते हैं। इस बार भी मुस्तैद जवानों ने हमलावरों को ढेर तो कर दिया, लेकिन सवाल तो बच ही गया कि आखिर इतनी कड़ी व्यवस्था, चार स्तरों की सुरक्षा को भेदकर आतंकी अपने मकसद पर आगे कैसे बढ़ सके?

अतीत के कई मामले भी इस बहस को आधार देते हैं। आतंकियों ने अत्यंत कड़ी सुरक्षा वाले श्रीनगर एयरपोर्ट के एकदम करीब के इस कैंप पर तड़के चार बजे हमला किया, जिसके बारे में यह सरलीकृत बयान तो नहीं दिया जा सकता कि उस वक्त सब सो रहे होंगे। कश्मीर में हमारे सुरक्षा बल कितने चौकस हैं, यह बताने की जरूरत नहीं, लेकिन आतंकी अगर पैदल चलकर कैंप परिसर की किसी इमारत तक पहुंचने और छिपने में कामयाब हो जाएं, तो चिंता करनी होगी। यही बटालियन संवेदनशील श्रीनगर एयरपोर्ट के रनवे की सुरक्षा संभालती है। इसी कैंप के नजदीक श्रीनगर का पुराना वायु क्षेत्र व बीएसएफ-सीआरपीएफ के ट्रेनिंग कैंप भी हैं। चिंता इन्हीं कारणों से बढ़ जाती है और सवाल ज्यादा व्यापक कि इतने हाई सिक्योरिटी जोन में यह सब मुमकिन कैसे हुआ? पड़ताल का मुद्दा है कि बिना किसी वाहन के आए इन आतंकियों ने कितने दिन की रेकी की होगी और तब इस नतीजे तक पहुंचे होंगे। उनका पैदल आकर मकसद तक पहुंच जाना ज्यादा खतरनाक है, बनिस्बत किसी वाहन से आत्मघाती शक्ल में आना। क्या आतंकी महज इसी शिविर पर हमले के इरादे से आए थे? या इरादा एयरपोर्ट पर तबाही मचाने का था, जहां शायद सीआरपीएफ की मुस्तैदी से वे सफल न हो सके हों। हमले के पीछे जैश के हाथ और आतंकियों के पास भारी मात्रा में विस्फोटक होना इरादे का संकेत दे रहा है। 

सरकार अब भले ही चूक की बात स्वीकार करे और हम भविष्य में उन्हें बड़ी कीमत चुकाने पर मजबूर भी कर दें, लेकिन इस बात पर तो गौर करना ही होगा कि हम अपने सुरक्षा बलों और उनके शिविरों की सुरक्षा का कोई फुलप्रूफ सिस्टम शायद अभी तक विकसित नहीं कर पाए हैं। प्राय: कहा जाता है कि हमलावर रणनीति बदलकर आता है और हम धोखा खा जाते हैं, लेकिन इस बार ऐसा भी नहीं था। सोचना होगा कि आतंकियों ने पिछले कई बार की तरह इस बार भी हमले के लिए सुबह का ही वक्त चुना, और हम इस बार भी फेल दिखे। हमले के वक्त का चयन सबसे बड़ा व चौंकाने वाला सवाल है और बताता है कि सब कुछ बहुत सोचा-समझा था। यह तो विशेषज्ञ भी मानते हैं कि ड्यूटी बदलने सहित कई कारणों से सुबह का वक्त कुछ शिथिल होता है, और शायद इसी कारण आतंकियों को यह वक्त माकूल लगा हो। अतीत में भी सुबह हमारे कैंपों पर भारी पड़ी है। 2016 में उरी सेक्टर में सेना के कैंप और बाद में बांदीपोरा के सीआरपीएफ कैंप पर हमले भी सुबह इसी वक्त के आस-पास हुए थे। कुछ और मामलों में भी सुबह की गतिविधियां संदिग्ध पाई गई थीं। एजेंसियों की प्राथमिकता भी अब शायद इसी में होनी चाहिए कि आखिर आतंकियों ने अपनी घड़ी की सुइयां सुबह की ओर क्यों सेट कर रखी हैं? हमें उनकी इस बदली हुई नीति और नीयत को पहचानकर रणनीति बनानी होगी। सोचना होगा कि टेररिस्तान के टेरर कैसा जवाब देना है?

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  • Web Title:Editorial of Hindustan Hindi Newspaper 4th of October 2017