Editorial of Hindustan Hindi Newspaper 23rd of December 2017 - अलग-थलग अमेरिका DA Image
20 फरवरी, 2020|11:30|IST

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अलग-थलग अमेरिका

यरुशलम मामले पर संयुक्त राष्ट्र में मतदान से ठीक पहले अमेरिकी दूत निक्की हेली जब कह रही थीं कि ‘अमेरिका इस दिन को याद रखेगा, जब उसे एक संप्रभु राष्ट्र के तौर पर फैसला लेने के लिए निशाना बनाया गया है।’ तब वह परोक्ष रूप से उन सभी देशों को धमकी दे रही थीं, जो अमेरिका नहीं, बल्कि डोनाल्ड ट्रंप की दादागीरी के खिलाफ खड़े दिख रहे थे। ट्रंप पहले ही यह कहकर कि वे हमसे अरबों डॉलर की मदद भी लेते हैं और हमारे खिलाफ मतदान भी करते हैं, ऐसे देशों की आर्थिक मदद रोकने की धमकी दे चुके थे। ऐसे में, संयुक्त राष्ट्र में यरुशलम को मान्यता देने के अमेरिकी इरादे को ध्वस्त कर विश्व समुदाय ने एक दूरगामी संदेश दिया है। इतिहास गवाह है कि जब-जब किसी इंसान या देश ने स्वयं को असल से कहीं अधिक मानने की हेकड़ी दिखाई, नतीजे खराब रहे हैं। यही कारण है कि आज अमेरिका भी अलग-थलग दिखाई दे रहा है। इसमें अमेरिका कम, ट्रंप का सिर चढ़कर बोलता अहं ज्यादा जिम्मेदार है। संयुक्त राष्ट्र में ट्रंप का यह हश्र उसी दिन तय हो गया था, जब दशकों पुरानी अमेरिकी कूटनीति की दिशा बदलते हुए उन्होंने यरुशलम को इजरायल की राजधानी मानने की इकतरफा घोषणा की थी। ट्रंप ने वह नीति बदली थी, जिसे उनके पूर्ववर्ती व्यापक अमेरिकी हितों को देखते हुए ठंडे बस्ते में डालते आए थे। इसी नासमझी भरी जिद का नतीजा है कि आज अमेरिका एक हफ्ते में दूसरी बार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग पड़ता दिखाई दिया है। मामूली बात नहीं है कि अमेरिकी जिद को बुरी तरह नकारते हुए भारत सहित 128 देशों ने संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव के पक्ष में वोट दिए, जबकि 35 देश गैरहाजिर रहे। इजरायल के अलावा जिन सात देशों ने अमेरिका के पक्ष में वोट डाले, उनमें होंडुरास,ग्वाटेमाला या टोगो जैसे देशों को देख ‘क्या पिद्दी और क्या पिद्दी का शोरबा’ वाली कहावत याद आ जाती है। पहले स्वयं डोनाल्ड ट्रंप और बाद में निक्की हेली की खुली धमकी को धता बताती विश्व जनमत की ऐसी एकजुटता भविष्य के लिए सुखद संकेत है। यह संदेश भी कि विध्वंसकारी फैसले विश्व के सचेत देशों को स्वीकार्य नहीं। यरुशलम को इजराइल की राजधानी मानने का ट्रंप का फैसला मध्य-पूर्व में तनाव की जो नई इबारत लिखने जा रहा है, उसका ऐसा ही निषेध जरूरी था। इस एकजुटता को महज मध्य-पूर्व में तनाव को बढ़ने से रोकने ही नहीं, बल्कि ब्लैकमेल करने और डराने की अमेरिकी कोशिशों के निषेध के शानदार उदाहरण के तौर पर भी याद रखा जाना चाहिए। जाहिर सी बात है कि इजरायल को यह नहीं रास आना था, सो नहीं ही आया, लेकिन यह एक अमेरिकी जिद या इजरायली हित की चिंता करने का नहीं, व्यापक वैश्विक हितों को देखने का वक्त है। यरुशलम को राजधानी की मान्यता देने का मुद्दा किसी एक देश की दादागीरी कायम करने या गिराने का नहीं, वैश्विक सहमति का मामला है और इसे इजरायल और फलस्तीन के बीच शांति समझौते की राह से ही हल किया जा सकता है। यह कई मायनों में बडे़ संकेत और दूरगामी संदेश वाली घटना भी है। इस बात का संकेत भी कि दुनिया में जनमत किस पक्ष में खड़ा है? इजरायल की बात तो समझी जा सकती है, लेकिन अमेरिका की जिद किसी के गले कैसे उतरे? डोनाल्ड ट्रंप शायद यही सच समझने से चूक गए। नतीजा, आज वह अलग-थलग खड़े हैं। महज चंद छोटे देशों का समर्थन कूटनीतिक इतिहास में अमेरिका को लगे झटके की सबसे बड़ी घटना है, और कहने में गुरेज नहीं कि इसके लिए सिर्फ और सिर्फ डोनाल्ड ट्रंप की विशिष्ट दिखने और दादागीरी दिखाने की उत्कंठा भरी जिद जिम्मेदार है।

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  • Web Title:Editorial of Hindustan Hindi Newspaper 23rd of December 2017