Editorial of Hindustan Hindi News Paper 19th of September - विकास का कद DA Image
21 फरवरी, 2020|11:36|IST

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विकास का कद

दोष हम अपने देश की अर्थव्यवस्था पर भी मढ़ सकते हैं, उसकी समाज-व्यवस्था पर भी और राजनीति के मत्थे दोष मढ़ना तो खैर सबसे आसान होता है। कुपोषण के कारण अगर देश के बच्चों का कद कम हो रहा है, तो यह सिर्फ आज की समस्या नहीं है, बल्कि एक ऐसी समस्या है, जो सीधे देश के भविष्य पर आघात कर रही है। इसलिए भी यह छोटी समस्या नहीं है कि देश के एक तिहाई से ज्यादा बच्चे इसका शिकार बन रहे हैं और बिहार जैसे राज्यों में तो यह आंकड़ा 50 फीसदी को छू रहा है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-4 के अनुसार, इसमें गांव और शहर का फर्क नहीं है। कुपोषण और उसके बुरे नतीजे, दोनों ही जगह तकरीबन एक जैसे हैं। यह खबर हमें उस समय मिल रही है, जब हम यह मान बैठे हैं कि खाद्यान्न के मामले में देश पूरी तरह आत्मनिर्भर है। बावजूद इसके कि उसे आत्मनिर्भर बनाने वाली कृषि और किसानों की स्थिति ठीक नहीं है। हालांकि आत्मनिर्भरता के इस पूरे दौर में कुपोषण की समस्या ने देश को कभी अलविदा नहीं कहा और इसीलिए मानव विकास सूचकांक के पैमाने पर हम श्रीलंका व पाकिस्तान जैसे पड़ोसियों से कई मामलों में पीछे रहे हैं। बल्कि अविकसित देशों की फेहरिस्त में जगह पाने वाले कई देश भी इस मामले में हमसे आगे खड़े दिखाई देते हैं। 

यह स्थिति तब है, जब हमारे अर्थशास्त्री यह बताते नहीं थकते कि आने वाले कई बरस तक हम दुनिया के सबसे ज्यादा युवा देशों में शुमार रहेंगे। सबसे बड़ी युवा आबादी हमारे पास होगी और इस युवा आबादी की उत्पादकता हमें विकासशील से विकसित देश में बदल देगी। लेकिन इस आकलन के साथ अब यह डर भी जुड़ गया है कि इस युवा आबादी का एक बड़ा हिस्सा कुपोषण के कारण अपनी बहुत सारी उत्पादक क्षमता बचपन में ही खो चुका होगा। और यह मामला सिर्फ उत्पादकता में कमी या आर्थिक लक्ष्यों से पीछे रह जाने भर का नहीं है। यह मामला एक ऐसे समाज की ओर बढ़ने का है, जहां एक बड़ा हिस्सा कुपोषण के नतीजों से त्रस्त तो होगा ही, साथ ही कई तरह के रोगों से भी जूझ रहा होगा। यह सर्वे हमें सिर्फ डराता ही नहीं, बल्कि अपने समाज के कई सच भी बताता है। जैसे मिड-डे मील योजना का सच। कुछ साल पहले बनी इस योजना से यह उम्मीद बांधी गई थी कि स्कूलों में चलाई जा रही इस योजना से न सिर्फ उनमें बच्चों की उपस्थिति बढ़ेगी, बल्कि इससे बच्चों को पर्याप्त पोषण भी मिलेगा। जाहिर है, अगर बच्चे फिर भी कुपोषित हैं, तो यह योजना अभी अपने लक्ष्यों से बहुत दूर है। हालांकि इसका समाधान मिड-डे मील योजना को खत्म करना नहीं, बल्कि इसके जरिये बच्चों को मिलने वाले पोषण को बढ़ाना ही हो सकता है।

परंपरागत सोच यही कहती है कि बच्चे किसी भी देश और समाज की तकदीर होते हैं, इसलिए बच्चों को कितना पोषण मिल रहा है, यह बताता है कि भविष्य को लेकर हम कितने गंभीर हैं। बेशक, इसमें यह जोड़ा जाना भी जरूरी है कि हमारे देश में अभी तक जो विकास हुआ है और हो रहा है, उसका लाभ सभी वर्गों को समान रूप से नहीं मिला है। आज भी देश का एक बड़ा वर्ग ऐसा है, जो अपने बच्चों को पर्याप्त पोषण दे पाने की स्थिति में भी नहीं है। वैसे यह मामला विकास की परिभाषा और उसका पैमाना बदलने का भी है। विकास को जीडीपी से नापने की बजाय अगर हम इस बात से नापें कि गरीब बच्चों की थाली में कितना भोजन और कितना पोषण पहुंंच रहा है, तो इससे उन बच्चों और हमारे भविष्य का भला तो होगा ही, साथ ही विकास की पहुंच भी व्यापक बनेगी। तभी हम अपने विकास को सही अर्थों में समावेशी कह सकेंगे।

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  • Web Title:Editorial of Hindustan Hindi News Paper 19th of September