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23 फरवरी, 2020|6:04|IST

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प्रतिष्ठा के लिए

माना जाता है कि जब परस्पर विरोध में खड़े दोनों ही पक्षों के दावों में सच्चाई की झलक मिल रही हो, तो असल सच इन दावों से कहीं ज्यादा बड़ा होता है। कर्नाटक के ऊर्जा मंत्री डीके शिवकुमार के ठिकानों और प्रतिष्ठानों पर देश भर में जो आयकर के छापे मारे गए हैं, उसे लेकर चल रही राजनीति काफी दिलचस्प है। कांग्रेस इन छापों को राजनीति से प्रेरित बता रही है। यह ऐसा आरोप है, जो आसानी से किसी के भी गले उतर सकता है, क्योंकि राजनीति से प्रेरित छापे इस देश के लिए कोई नई चीज नहीं है। अपने राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ छापों का इस्तेमाल तब भी होता रहा है, जब केंद्र में खुद कांग्रेस की सरकार थी। पार्टी का कहना है कि डीके शिवकुमार का दोष सिर्फ इतना है कि बेंगलुरु के उनके रिजॉर्ट में गुजरात के वे कांग्रेस विधायक रुके हुए हैं, जिन्हें दल-बदल से बचाने के लिए वहां लगभग ‘बंधक’ बनाकर रखा गया है। लेकिन इस दावे पर भी लोग आसानी से यकीन कर लेंगे कि इन छापों में करोड़ों रुपये की नगदी बरामद हुई है। भाजपा इसी को मुद्दा बनाकर छापों को जायज ठहरा रही है। दूसरी ओर केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली यह कह रहे हैं कि इसमें सरकार की कोई भूमिका नहीं है और छापे मारने का फैसला विभाग ने अपनी जांच के आधार पर ही लिया है। जाहिर है कि वित्त मंत्री के इस बयान पर हो सकता है कि बहुत से लोग यकीन न करें। वैसे डीके शिवकुमार की गिनती देश के सबसे अमीर मंत्रियों में होती है और एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म के अनुसार, उनकी घोषित संपत्ति 251 करोड़ रुपये की है। इसलिए उनके प्रतिष्ठानों से चंद करोड़ रुपये की बरामदगी आश्चर्यजनक नहीं है, पर अभी यह नहीं कहा जा सकता कि इसमें कितनी रकम काले धन की परिभाषा में आती है और कितनी नहीं?

जिन्हें हम राजनीतिक छापेमारी कहते हैं, उनकी अगर हम तह में जाएं, तो हमें हर बार राजनीति और काले धन का गठजोड़ दिखाई देगा। एक तरफ काले धन की मौजूदगी ही राजनीतिक छापों को मुमकिन बनाती है और दूसरी तरफ काले धन की वजह से ही इन छापों को जायज भी ठहराया जाता है। अगर राजनीति और काले धन का इस तरह का गठजोड़ न हो, तो न ऐसे छापे आसान होंगे और न उन्हें जायज ठहराना। इस पूरे घटनाक्रम के साथ वह चीज भी जुड़ी हुई है, जिसे हम रिजॉर्ट की राजनीति भी कहते हैं। विधायकों की सौदेबाजी को रोकने के लिए उन्हें किसी रिजॉर्ट में ले जाकर ‘बंधक’ बना देना भी पूरे देश में काफी समय से चल रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले यह राज्य में सरकार बनाने के लिए होता था और इस बार यह महज एक राज्यसभा सीट जीतने के लिए हो रहा है। देश में छापों की राजनीति और रिजॉर्ट की राजनीति, दोनों ही होती रही है, लेकिन यह पहली बार हो रहा है, जब रिजॉर्ट की राजनीति का जवाब छापे की राजनीति से दिया जा रहा है।
लोकतंत्र की राजनीति ने देश को कितना कुछ दिया है, यह गिनाने की जरूरत नहीं है। यही राजनीति है, जो हमें अपने पड़ोसी देशों से अलग और बेहतर बनाती है। लेकिन इस प्रक्रिया में कुछ प्रदूषण भी राजनीति में आ गए हैं, जिनसे हम मुक्त होने की कोशिश नहीं कर रहे, इसलिए वे गहराते जा रहे हैं। कुछ मौके ऐसे भी आते हैं, जहां ये बुराइयां चरम पर पहंुचती दिखाई देती हैं। गुजरात और कर्नाटक में जो हो रहा है, वह ऐसा ही एक नमूना है। और यह काम भी राज्यसभा की महज ऐसी एक सीट के लिए हो रहा है, जिसकी जीत या हार से कोई बहुत बड़ा फर्क नहीं पड़ने वाला। इसे मूंछ का सवाल बना लिया गया है, इसी चक्कर में दोनों दलों की असल पूंछ भी उजागर हो गई है। क्षुद्र स्वार्थों ने अपने आप ही हकीकत का विस्तार सामने ला दिया है।

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  • Web Title:Editorial of Hindustan Daily Newspaper 3rd of August 2017