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13 अगस्त, 2020|1:15|IST

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नोटबंदी के सच

नोटबंदी की बहस एक बार फिर सतह पर आ गई है। नोटबंदी के बाद बैंकों में जमा हुई नगदी पर रिजर्व बैंक के आंकड़ों के आते ही वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इसकी सफलता का ब्योरा पेश करते हुए इसके तमाम फायदे गिना दिए हैं। विपक्ष इनसे सहमत नहीं है, इसलिए उसने आलोचनाओं के ढेर लगा दिए हैं। सच यह है कि न तो यह कहा जा सकता है कि नोटबंदी बिल्कुल भी फायदेमंद नहीं रही और न यह कहा जा सकता है कि इससे कोई नुकसान नहीं हुआ। इसकी वजह से हुई तकलीफें और इससे हुए फायदे पिछले दस महीने से गिनाए जा रहे हैं। पर असल सवाल यह है कि इससे तकलीफें ज्यादा हुईं या इसके फायदे ज्यादा थे। यह ऐसा सवाल है, जिस पर रिजर्व बैंक भी मौन है और देश के आला अर्थशास्त्री भी। इसके अलावा बाकी जो भी कहा जा रहा है, उसमें खारिज करने लायक भले ही बहुत कुछ हो, पर उसे सिर्फ राजनीति कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। 
नोटबंदी की घोषणा करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसके जो फायदे गिनाए थे, सिर्फ उनके ही हिसाब से देखें, तो एकबारगी लग सकता है कि नोटबंदी अपने लक्ष्यों को हासिल करने में नाकाम रही। काले धन पर रोक लगना तो दूर, इससे काले धन को बहुत ज्यादा पकड़ा नहीं जा सका। करीब 99 प्रतिशत नोट अगर बैंकिंग व्यवस्था में वापस आ गए, तो यह माना जा सकता है कि काले धन से मुक्ति महज एक फीसदी ही मिली। इसके मुकाबले 1978 की नोटबंदी को ज्यादा सफल माना जाएगा, जब दो फीसदी नोट बैंकिंग व्यवस्था में वापस आने से रह गए थे। हालांकि यह तुलना बहुत आसान नहीं है, क्योंकि तब बड़े नोट बहुत कम लोगों के पास थे और आम आदमी ने उन्हें देखा तक नहीं था, लेकिन इस बार जिन नोटों को बंद किया गया, वे आम आदमी के पास थे, यानी उन्हें बैंकों में बड़े पैमाने पर खपाना पहले की तरह कठिन भी नहीं था। एक दावा यह था कि इससे जाली नोटों से काफी हद तक मुक्ति मिल जाएगी, तो उस लक्ष्य के भी हम करीब नहीं पहंुच सके हैं। नोटबंदी से आतंकवाद पर कितनी लगाम लगी, इस पर दावे तो किए जा रहे हैं, लेकिन अभी कुछ भी पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता। एक सच यह जरूर है कि नोटबंदी के बाद आयकर दाताओं की संख्या तेजी से बढ़ी है और पैसे की हेरा-फेरी में लगी कंपनियों को काफी नुकसान पहंुचा है। ये फायदे दीर्घकाल के हिसाब से कितने बड़े हैं, अभी यह नहीं कहा जा सकता। जैसे आयकर दाताओं की संख्या तो बढ़ी है, लेकिन आयकर संग्रह कितना बढ़ेगा, हमें नहीं पता। सवाल फिर भी यही है कि क्या यह फायदा, नोटबंदी से लोगों को हुए कष्टों से ज्यादा बड़ा है? देश में आयकर दाताओं की संख्या बढ़नी चाहिए, यह हर कोई मानता है, लेकिन क्या सिर्फ इसी के लिए नोटबंदी जैसे बड़े कदम के अलावा कोई चारा नहीं था? और क्या सिर्फ इसी के लिए मंदी और बेरोजगारी के बढ़ने को स्वीकार किया जाना चाहिए?
इन नुकसान और फायदों से अलग नोटबंदी के बाद के दस महीनों की कहानी हमारे समाज और हमारी अर्थव्यवस्था के बारे में बहुत कुछ कहती है। नोटबंदी एक बहुत बड़ा कदम था, या यूं कहें कि एक बहुत बड़ा झटका था और इसके बाद हमारे समाज और हमारी अर्थव्यवस्था ने उसी तरह व्यवहार किया, जिस तरह का व्यवहार कोई परिपक्व समाज या कोई परिपक्व अर्थव्यवस्था करती है। लंबी लाइनें लगीं, लोगों को परेशानियां हुईं, बाजार और उद्योग को नुकसान हुआ, पर वैसी अव्यवस्था कहीं नहीं दिखी, जैसी कभी वेनेजुएला में नोटबंदी के बाद दिखी थी। नोटबंदी जैसे बड़े झटके को देश इतनी आसानी से झेल गया, यह कोई छोटी बात नहीं है। 

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