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प्यार का समाजशास्त्र

 

प्यार क्या है? यह ऐसा सवाल है, जो सदियों से साहित्य, धर्म, दर्शन, मनोविज्ञान, समाजशास्त्र, शरीर विज्ञान और यहां तक कि रसायनशास्त्र तक को परेशान करता रहा है। सबने अपने-अपने तरीके से इसकी व्याख्या की है। व्याख्या जो भी हो, इनमें से ज्यादातर ने प्यार को जीवन का एक सकारात्मक मूल्य माना है। यह बात अलग है कि आज भी ऐसे बहुत से सामाजिक संगठन और संस्थाएं हैं, जो कई मामलों में प्यार को अपराध का दर्जा दे देते हैं और प्यार करने वालों के साथ अपराधियों जैसा सुलूक भी करते हैं। हालांकि ज्यादातर मामलों में इसकी वजह महज यह होती है कि ऐसा प्यार कई बार अक्सर उन संस्थाओं के उस अनुशासन से टकराता दिखता है, जिनका वास्तव में कोई सकारात्मक अर्थ नहीं है। लेकिन अब रसायनशास्त्र ने प्यार की एक नई सामाजिक व्याख्या की ओर इशारा किया है, जो हमारे लिए काफी महत्वपूर्ण है। 
रसायनशास्त्र के हिसाब से प्यार में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, हमारे शरीर में पाया जाने वाले ऑक्सीटोसिन नाम का रसायन। इसे अक्सर सेक्स हारमोन भी कहा जाता है। यह तकरीबन सभी स्तनधारी प्राणियों में पाया जाता है। पक्षियों में इस रसायन का एक दूसरा रूप होता है, जिसे मेसेटोसिन कहते हैं, भूमिका इसकी भी वही होती है। यूनिवर्सिटी ऑफ नेबरेस्का लिंकन के वैज्ञानिकों ने कुछ पक्षियों को इस रसायन की अतिरिक्त खुराक दी। यह प्रयोग कोयल के आकार वाले पिनयन जे नाम की पक्षी पर किया गया। चीड़ के पेड़ों पर घोंसला बुनने वाले पिनयन जे जोड़ी बनाकर रहते हैं और इन जोड़ियों के बड़े-बड़े समूह होते हैं। अपने प्रयोग में वैज्ञानिकों ने पाया कि जिन पक्षियों के शरीर में यह अतिरिक्त खुराक गई, उनका सामाजिक व्यवहार कई तरह से बदल गया। एक तो इसके कारण उन पक्षियों का अपने समूह के अन्य पक्षियों से सामान्य मेल-मिलाप बढ़ गया। सबसे बड़ी बात उन्होंने यह पाई कि ऐसे पक्षियों ने मिलने वाला सारा खाना खुद ही चट कर जाने की बजाय, उसे अपने साथी के साथ मिल-बांटकर खाना शुरू कर दिया। वैज्ञानिकों ने पाया कि ऐसे पक्षियों में विनम्रता भी बढ़ गई। मोटे तौर ये वैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुंचे कि इस हारमोन को भले ही प्यार और सेक्स से जोड़कर देखा जाता हो, लेकिन वह एक बहुत बड़ी सामाजिक भूमिका भी निभाता है, जो इस हारमोन के बढ़ने के साथ ही बढ़ जाती है। हालांकि स्तनधारियों या खासकर इंसान में ऑक्सीटोसिन भी ठीक ऐसी ही भूमिका निभाता होगा, ऐसा अभी दावे के साथ नहीं कहा जा सकता। लेकिन पिनयन जे पर हुए प्रयोग ने यह तो साबित कर ही दिया कि इस तरह का हारमोन एक से ज्यादा तरह की भूमिकाएं निभाता है। 
हालांकि मानव समाज के समीकरण पक्षी समाज के समीकरणों की तरह सरल नहीं हैं। धर्म, जाति, रंग, भाषा, क्षेत्र, देश और यहां तक कि सामाजिक व आर्थिक हैसियत की दीवारों ने इसे ढेर सारी जटिलताएं दे दी हैं। ऐसी जटिलताएं कट्टरता पैदा करती हैं, जो न विज्ञान की सुनती हैं, न मनोविज्ञान की देखती हैं और न समाजशास्त्र को समझती हैं। इसलिए जिस प्रेम को समाज का नायक होना चाहिए था, उसे समय-समय पर खलनायक बना दिया जाता है। शरीर क्रिया विज्ञान हमें एक और सुबूत दे रहा है कि जिसे हम प्यार कहते हैं, वे हमारे समाज को तोड़ने का नहीं, जोड़ने का उपक्रम है।

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  • Web Title:Editorial Hindustan Column on 16 april