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अतार्किक गोपनीयता

 

बैंक के जरिये किसी राजनीतिक पार्टी को दान के वैध तरीके अर्थात इलेक्टोरल बॉन्ड पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय चुनावी पारदर्शिता बढ़ाने की दिशा में सकारात्मक और स्वागतयोग्य है। शुक्रवार को कोर्ट ने इस चर्चित और विवादित बॉन्ड पर तत्काल रोक तो नहीं लगाई, लेकिन उसकी गोपनीयता को अंधेरे से उजाले में लाने का संकेत दे दिया है। हालांकि गोपनीयता के नाम पर यह अंधेरा जनता के लिए अभी कायम रहने वाला है, लेकिन तमाम राजनीतिक पार्टियों को बंद लिफाफे में बॉन्ड से प्राप्त दान और दानदाता की सूचना चुनाव आयोग को 30 मई तक देनी पडे़गी। गौर करने की बात है कि इन बंद लिफाफों को खोलने का हक सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को भी नहीं दिया है। इस बॉन्ड के बारे में सुप्रीम कोर्ट आगे सुनवाई करेगा। आयकर कानून, चुनावी कानून और बैंकिंग नियमों के तहत इसकी उपयोगिता देखना और चुनावी पारदर्शिता के साथ समन्वय बिठाना जरूरी है। इस बॉन्ड की शिकायत नई नहीं है। भाजपा को छोड़कर उन तमाम पार्टियों में रोष रहा है, जिनको इस बॉन्ड के जरिए दान नहीं मिल रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर भी ध्यान दिया है कि सत्ताधारी पार्टी इस बॉन्ड से ज्यादा फायदा उठा रही है। अनुमान इशारा करते हैं कि कुल इलेक्टोरल बॉन्ड का 95.5 प्रतिशत से 97 प्रतिशत हिस्सा केवल सत्ताधारी पार्टी के खाते में गया है। बॉन्ड प्रयोग के पहले ही चरण में सिद्ध हो गया है कि जो भी सत्ता में रहेगा, वह इसके फायदे ज्यादा लेगा। एक दूसरा खतरा यह भी है कि दान और दानदाता के बारे में सूचना केवल जनता के लिए गोपनीय रहती है। बैंक और सरकार को यह अच्छे से पता है कि कौन किसको धन दे रहा है। आज जो पार्टी सरकार में नहीं है, कल वह सरकार में आएगी, तो वह भी जान जाएगी कि पिछली सत्ताधारी पार्टी को कौन कितना धन दे रहा था। हमें सोचना होगा कि ऐसी गोपनीयता लोकतंत्र के हित में नहीं है, जो दान को लगभग एकतरफा कर दे, जो राजनीतिक विद्वेष बढ़ा दे और जो दानदाता को मुश्किल में डाल दे। 
बेशक, इस बॉन्ड को काले धन के प्रयोग में कमी लाने और राजनीतिक चंदे को वैध बनाने के मकसद से लाया गया है, लेकिन याचिकाकर्ताओं की शिकायत है कि ऐसा नहीं हो रहा है। जानकारों के अनुसार, फर्क केवल इतना पड़ा है कि पहले दान नगद मिलता था और अब बॉन्ड के जरिये मिलता है, गोपनीयता पहले भी थी और आज भी है। लेकिन बड़ा प्रश्न यह है कि ऐसी अतार्किक गोपनीयता और उसका ऐसा हास्यास्पद बचाव कब तक किया जाएगा? लोकतांत्रिक शक्ति की एक मूलभूत अनिवार्यता है पारदर्शिता। राजनीतिक हिसाब-किताब में पारदर्शिता यदि नहीं रहेगी, तो राजनीति कितनी विश्वसनीय होगी? 
हमारे देश में राजनीतिक पार्टियां सूचना के अधिकार के दायरे में नहीं आतीं। वे दान लेकर सेवा का दावा करती हैं, लेकिन उपभोक्ता कानूनों के दायरे में नहीं आतीं। वाकई, हमें राजनीति और चुनाव सुधार की दिशा में अभी एक लंबा सफर तय करना है। पारदर्शिता से राजनीतिक पार्टियों को अंतत: लाभ ही होगा। उन्हें तब गोपनीयता का कोई बोझ नहीं ढोना पड़ेगा। मतदाताओं को भी मालूम होगा कि उनके नेता की जेब में किसका-कितना पैसा है। सही मतदान के लिए ऐसी सूचना या जागरूकता जरूरी है।

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  • Web Title:Editorial Hindustan Column on 13 april