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प्यासे शहर

यह जल संकट की बात करने का मौसम नहीं होता। जल संकट की बात देश में आमतौर पर अप्रैल के आस-पास शुरू होती है और जून के मध्य तक खत्म होने लग जाती है। मानसून भले ही देर से आए या उसकी बौछारों में कसर रह जाए, जुलाई आते-आते सूखे की आशंकाएं भले ही खेत-खलिहान में गहराने लगें, लेकिन शहरी जल संकट की तीव्रता इस समय तक समाप्त होने लगती है। लेकिन इस बार अगर हम जुलाई में भी जल संकट की चर्चा कर रहे हैं, तो यही बताता है कि समस्या सचमुच कितनी गंभीर हो चुकी है।

जल संकट की इन्हीं चर्चाओं के बीच तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई से एक खबर यह आई है कि वहां जल संकट इतना ज्यादा गहरा चुका है कि अस्पतालों में भी इतना पानी नहीं उपलब्ध हो पा रहा कि डॉक्टर ऑपरेशन कर सकें। पानी की भीषण कमी को लेकर चेन्नई काफी समय से चर्चा में रहा है। एक समय तो यह घोषणा कर दी गई थी कि 19 जून के बाद शहर में एक बूंद पेयजल भी उपलब्ध नहीं होगा। पूरे प्रदेश से लाए गए पानी के टैंकर किसी तरह दक्षिण भारत के इस खूबसूरत और आधुनिक शहर की प्यास बुझा रहे हैं, लेकिन सब जानते हैं कि यह सिर्फ एक कामचलाऊ व्यवस्था ही है। यह उस शहर की बात है, जिसे पर्यटन गाइड बुक बनाने वाली कंपनी लोनली प्लैनेट ने दुनिया के उन 15 शहरों की सूची में शामिल किया था, जहां पर्यटकों को जरूर जाना चाहिए। चार साल में ही स्थिति यहां तक पहुंच चुकी है कि चेन्नई के कई होटल सिर्फ पानी की कमी के कारण बंद हो चुके हैं।
 

वैसे अगर नक्शे पर चेन्नई को देखें, तो लगता ही नहीं कि इस शहर को कभी पानी की समस्या से दो-चार होना पड़ सकता है। इसके एक तरफ लहराता हुआ समुद्र है, तो नगर के भीतर कई जगह पानी के बड़े जलाशय और छोटे-छोटे तालाब दिखाई देते हैं। इस शहर में चार बडे़ जलाशय हैं, जिनकी कुल क्षमता 11 अरब क्यूबिक फीट है। यानी ये चार जलाशय ही महीनों तक शहर की प्यास बुझा सकते हैं। लेकिन लगातार तीन साल मानसून इस शहर से नाराज रहा, इसलिए इस समय ये चारों सूखे पड़े हैं। ज्यादातर तालाबों पर कब्जे हो चुके हैं, जो जलधाराएं नगर के आस-पास से बहती हैं, उसमें यहां का सीवर बहाया जाता है, इसलिए उनका पानी पीने तो क्या साधारण इस्तेमाल के लायक भी नहीं रहा। बेशक इस जल संकट का एक कारण प्रकृति की नाराजगी भी है, पर सच तो यह है कि इस स्थिति के लिए हमारी व्यवस्थाएं भी कम गुनहगार नहीं हैं। 
 

चेन्नई आज जहां पहुंच गया है, देश के अन्य महानगर भी धीरे-धीरे उसी दिशा में बढ़ रहे हैं। महानगर तो क्या छोटे-छोटे शहरों और कस्बों का हाल भी यही है। महाराष्ट्र का 25 लाख की आबादी वाला छोटा सा जिला बीड पानी के लिए पूरी तरह टैंकरों पर निर्भर हो चुका है। ऐसे शहरों की प्यास अब कुआं नहीं खोजती, टैंकर का इंतजार करती है। वहां हर रोज 900 टैंकरों में भरकर पानी लाया जाता है, जो इतनी बड़ी आबादी की प्यास बुझाने के लिए नाकाफी हैं। दूरदराज के गांवों का हाल तो और बुरा है, क्योंकि वहां ये टैंकर नियमित तौर पर नहीं पहुंच पाते। ये हालात हमारे शहरों के लिए ही नहीं, पूरे देश के लिए एक गंभीर चेतावनी हैं। हमने तुरंत समाधान नहीं खोजे और कदम नहीं उठाए, तो चेन्नई जैसे हालात हर दरवाजे पर दस्तक दे रहे होंगे। 

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