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निदेशक की वापसी

सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई के निदेशक आलोक वर्मा को जबरन दी गई छुट्टी को रद्द करते हुए उन्हें वापस उनकी कुरसी पर स्थापित कर दिया है। अब वह फिर से अपने दफ्तर जाना शुरू कर सकते हैं, लेकिन इसके आगे की कहानी थोड़ी टेढ़ी है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि वह अपने पद पर तो पहुंच जाएंगे, लेकिन कोई नीतिगत फैसला नहीं कर सकेंगे। वह ट्रांसफर आदि का काम भी नहीं कर पाएंगे। इसका एक अर्थ हम यह भी लगा सकते हैं कि जिन आरोपों के तहत सरकार ने आलोक वर्मा और सीबीआई में उनके बाद दूसरे नंबर के अधिकारी को रात दो बजे छुट्टी पर भेज दिया था, उन आरोपों के चलते सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें शक के दायरे में रखा है। सरकार का तर्क था कि केंद्रीय सतर्कता आयोग की सिफारिश पर उसने यह कदम उठाया था। सुप्रीम कोर्ट का तर्क है कि उनके खिलाफ कार्रवाई के लिए जो प्रक्रिया अपनाई गई, वह गलत थी। गलत प्रक्रिया द्वारा लिया गया फैसला अब अदालत में गलत ठहरा दिया गया है, इसलिए आलोक वर्मा को वापस अपनी कुरसी पर पहंुचना ही था। लेकिन अदालत के फैसले से यह सवाल तो उठा ही है कि क्या इससे सीबीआई एक ऐसी संस्था में नहीं बदल जाएगी, जिसके मुखिया को कोई बड़ा नीतिगत फैसला करने की इजाजत ही नहीं होगी? हालांकि आलोक वर्मा का कार्यकाल 31 जनवरी तक ही बचा है, लेकिन देश की सर्वोच्च जांच एजेंसी के लिए यह कोई छोटा समय नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने इसकी दूसरी व्यवस्था दी है, उसने प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधान न्यायाधीश को एक सप्ताह के भीतर मिलकर इस पर फैसला करने को कहा है। उम्मीद की जानी चाहिए कि मसला एक सप्ताह के भीतर निपट जाएगा।
लेकिन जो समस्या है, वह ज्यादा बड़ी है। देश की सर्वोच्च जांच एजेंसी में पिछले कुछ साल के भीतर वह सब कुछ हो चुका है और कई बार हो चुका है, जो किसी संस्था की प्रतिष्ठा को मटियामेट करने के लिए पर्याप्त होता है। सीबीआई की साख इस कदर गिर चुकी है कि सुप्रीम कोर्ट को मजबूर होकर उसे एक अन्य मामले में पिंजरे का तोता कहना पड़ा। यानी एक ऐसी संस्था, जिसकी अपनी कोई आवाज नहीं, वह बस अपने मालिक की बात ही बोलता है। सरकारों द्वारा सीबीआई के दुरुपयोग के एक या दो नहीं, ढेरों उदाहरण हैं। बेशक, इसे लेकर सरकारों पर उंगली उठाई जानी चाहिए, लेकिन बार-बार सीबीआई एक ऐसी संस्था साबित हुई, जिसने अपना दुरुपयोग होने दिया। और ताजा मामले में सीबीआई के आला अधिकारियों पर भ्रष्टाचार तक के आरोप लगाए गए हैं। ये आरोप कहीं बाहर से नहीं आए, बल्कि उसके अधिकारियों ने ही एक-दूसरे पर लगाए थे। इसलिए ताजा मामले से भी बड़ा मुद्दा सीबीआई की साख को बहाल करने का है।
हमें नहीं पता कि एक सप्ताह के भीतर जब प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और प्रधान न्यायाधीश मिलेंगे, तो क्या निर्णय करेंगे। मगर यह उम्मीद तो की ही जानी चाहिए कि वे सीबीआई को उस कीचड़ से निकालने की कोशिश करेंगे, जिसके छीटें गाहे-बगाहे सभी पर पड़ते रहे हैं। वैसे तो देश में कुछ एक अपवाद को छोड़कर तकरीबन सभी संस्थाओं की साख पर सवाल उठ रहे हैं, जिसे राजनीतिक भ्रष्टाचार का कारण भी माना जाता है और नतीजा भी। बहरहाल, यह एक मौका है, जब हम सीबीआई से शुरुआत करके सभी संस्थाओं को बदल सकते हैं।

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  • Web Title:editorial hindustan column for 9th january