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मूर्तियों की राजनीति

 

राजनीतिक मूर्तियां फिर विवाद में हैं। सुप्रीम कोर्ट ने बसपा प्रमुख मायावती की लगवाई गई मूर्तियों पर टिप्पणी की है। उनकी पार्टी के प्रतीक और खुद उनकी ये मूर्तियां उत्तर प्रदेश में उनके मुख्यमंत्री काल में लगी थीं। कोर्ट का कहना है कि उस खर्च की वसूली उनसे क्यों न की जाए? शीर्ष अदालत की यह टिप्पणी तमाम राजनीतिक पार्टियों के लिए  सबक बन सकती है। आखिर हर सरकार अपनी पार्टी के नायकों, नेताओं और प्रतीकों की मूर्तियां लगाने की होड़ में रहती है। इससे कोई  पार्टी अछूती नहीं है। अपनी सरकार में अपने हिसाब से मूर्तियां लगवाने का सिलसिला कोई नया नहीं है, बल्कि आजादी के कुछ वक्त बाद कांग्रेस के जमाने में ही यह शुरू हो गया था। हालांकि उस दौर में गांधीजी की ही मूर्तियां ज्यादा लगाई गईं। पर धीरे-धीरे और मूर्तियां लगने लगीं। विडंबना यह है कि हर सरकार जोर-शोर से यह काम करती है। लेकिन जब वह विपक्ष में होती है, तो इस काम का विरोध करने लगती है।
यूूं मूर्ति की राजनीति में दक्षिण का कोई जवाब नहीं। खासतौर से तमिलनाडु का। वहां तो इसकी होड़-सी लगी रहती है। आखिर कोई किसी से पिछड़ कैसे जाए? आमतौर पर माना यही जाता है कि तमिलनाडु की द्रविड़ पार्टियों ने मूर्ति की राजनीति खूब की। एक दौर था, जब किसी के जीवित रहते उसकी मूर्ति नहीं लगाई जाती थी। लेकिन साठ के दशक में के कामराज ने जीते जी अपनी मूर्ति बनवाई और लगवाई थी। उसके बाद तो वहां यह सिलसिला ही चल पड़ा।
पार्टियां सत्ता में आती हैं और जुट जाती हैं अपने नायकों, प्रतीकों की प्रतिमाएं लगाने के लिए। राष्ट्र नायकों की प्रतिमा की बात अलग है। लेकिन कभी-कभी तो खुद सरकार का मुखिया अपनी ही प्रतिमा लगवाने लगता है। सरकार के पास यह पैसा कहां से आता है? जाहिर है, यह आम आदमी का पैसा होता है। वह सरकार को जो टैक्स देता है, उसे ही सरकार खर्च करती है। कहने की जरूरत नहीं कि सरकारों को यह पैसा आमजन के विकास पर खर्च करना चाहिए। लेकिन ऐसा होता नहीं है। सरकार अपनी पार्टी की छवि चमकाने में लग जाती है। सबके विकास की बजाय अपने दल और नेता का प्रचार-प्रसार उनका असल मकसद हो जाता है। एक बात तय है। अगर आम आदमी का ख्याल रखना है, तो सरकार को ट्रस्टी की तरह ही काम करना होगा, जिसकी वकालत महात्मा गांधी करते थे। समाज में हाशिये पर खड़ा आदमी सरकार की पहली जिम्मेदारी है। उसके प्रति जिम्मेदारी का निर्वाह सरकारों का असली काम होना चाहिए। रही अपने नेताओं और प्रतीकों की प्रतिमा लगाने की बात, तो यह खर्च पार्टियों को खुद अपने कोष से करना चाहिए। उन्हें इसके लिए जमीन खरीदनी चाहिए। आम नागरिक का पैसा विकास कार्यों के अलावा कहीं और खर्च नहीं होना चाहिए। अगर वह खर्च होता है, तो यह एक नैतिक अपराध है। अपने देश काआम आदमी कोई बेहतर हाल में नहीं है। आबादी की एक बड़ी संख्या अब भी बुनियादी सुविधाओं के लिए ललक रही है। सड़क, बिजली, पानी, यातायात पर अभी बहुत काम होना बाकी है। आम आदमी के लिए अब भी अपना इलाज करा पाना आसान नहीं है। शिक्षा अभी बेहतर हाल में नहीं है। कुल मिलाकर, अभी सरकारों को बहुत बुनियादी काम करना है। उसके लिए खूब पैसा चाहिए, जबकि उनके पास पैसा सीमित है। 

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  • Web Title:Editorial Hindustan Column for 9 february