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आरक्षण की राजनीति

सवर्ण जातियों के आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को दस फीसदी आरक्षण देने के फैसले की खूबियों और खामियों की चर्चा शायद अभी उतनी नहीं होगी, जितना कि इसे एक राजनीतिक पैंतरे के रूप में देखा जाएगा। आम चुनाव जब महज तीन-चार महीने दूर हों, तब सरकार के किसी भी फैसले को चुनाव की कसौटी पर ही देखा जाता है, उस लिहाज से भी आरक्षण एक बहुत बड़ा फैसला है। हमें यह भी बताया गया है कि जल्द ही इसके लिए संसद में एक संविधान संशोधन विधेयक पेश किया जाएगा। यह भी सच है कि इस लोकसभा का आखिरी सत्र है और उसमें भी चंद रोज का काम ही बाकी है, इसलिए फिलहाल यह विधेयक कितनी दूर तक जा पाएगा, यह अभी नहीं कहा जा सकता। अगर यह इस बार पास नहीं होता, तो यह एक ऐसा कदम तो है ही कि केंद्र में बनने वाली किसी भी सरकार पर अपना दबाव दिखाएगा। गरीब सवर्णों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण देने की मांग कोई नई नहीं है। यह हमेशा ही जहां-तहां उठती रही है, यहां तक कि दलितों की नेता मानी जाने वाली मायावती भी इसका वादा कर चुकी हैं। लेकिन पहली बार इसे बड़े पैमाने पर लागू करने का फैसला संविधान संशोधन के वादे के साथ हुआ है। संसद और सुप्रीम कोर्ट में इसके सामने जो बाधाएं आएंगी, उसे सरकार भी अच्छी तरह समझती ही होगी। इसलिए भी इसे चुनावी फैसले की तरह ही देखा जाएगा।
यह पहली बार है, जब किसी तबके की कमजोर आर्थिक स्थिति को आरक्षण से जोड़ा गया है। अभी तक देश में दलितों और पिछड़ी जातियों को जो आरक्षण मिलता रहा है, उसमें यह पैमाना नहीं था। आरक्षण के बारे में यह धारणा रही है कि यह आर्थिक पिछड़ापन दूर करने का औजार नहीं है। यह दलित, आदिवासी या पिछड़ी जातियों का सशक्तीकरण करके उन्हें सामाजिक रूप से प्रतिष्ठा दिलाने का मार्ग है। आरक्षण को सामाजिक नीति की तरह देखा जाता रहा है, साथ ही यह भी माना जाता रहा है कि आर्थिक पिछड़ापन दूर करने का काम आर्थिक नीतियों से होगा। अब जब आरक्षण में आर्थिक आधार जुड़ रहा है, तो जाहिर है कि आरक्षण को लेकर मूलभूत सोच भी कहीं न कहीं बदलेगी। 
आजादी के इतने साल बाद हमें आरक्षण की सीमाएं भी अच्छी तरह से समझ आ चुकी हैं। अभी तक जिन तबकों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण दिया गया है, उसमें से कुछ लोगों का सशक्तीकरण निश्चित रूप से हुआ है, लेकिन जिन लोगों को इसका लाभ मिला है, उनकी संख्या पूरे तबके के मुकाबले बहुत छोटी है। जाहिर है, जिन तबकों के लिए यह आरक्षण था, उनकी सारी समस्याओं का हल इनसे नहीं हुआ है। यह मानने का कोई कारण नहीं है कि सवर्णों में जो गरीब हैं, उन सबकी सारी समस्याओं का समाधान इस दस फीसदी आरक्षण से हो जाएगा। वह भी तब, जब सरकारी नौकरियां लगातार कम हो रही हैं। यह उम्मीद भी व्यर्थ है कि ऊंची जातियों के जो लोग अभी तक आरक्षण का विरोध करते थे, वे इस फैसले से संतुष्ट हो जाएंगे। आरक्षण की मांग और उसके विरोध के लगातार उग्र होते जाने का एक बड़ा कारण यह भी है कि हम अभी तक ऐसी अर्थव्यवस्था नहीं बना सके, जो सभी को रोजगार देने का सामथ्र्य रखती हो। संयोग से आरक्षण का यह फैसला उस दिन हुआ है, जब सेंटर फॉर मॉनीर्टंरग इंडियन इकोनॉमी ने बेरोजगारों की संख्या काफी तेजी से बढ़ने के आंकडे़ सार्वजनिक किए हैं।

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  • Web Title:Editorial Hindustan Column for 8 january