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सपनीले दौर में क्रिकेट

 

यह सपना तो नहीं! एक-डेढ़ साल पहले कौन सोच सकता था कि विदर्भ की टीम रणजी ट्रॉफी जीत लेगी? लगातार दूसरी बार भी जीत लेगी, यह तो गजब ढाने जैसा था। तीसरी बार भी कोई ऐसी टीम ट्रॉफी उठाएगी, जो तथाकथित बड़ी टीम नहीं मानी जाती। यानी मुंबई, कर्नाटक और दिल्ली। सचमुच अपना देसी क्रिकेट एक सपनीले दौर में जी रहा है। विदर्भ की जीत में भी एक कमाल की बात है। इस जीत में कोई बड़ा क्रिकेटर हीरो नहीं रहा है। उमेश यादव और वसीम जाफर ने अपनी टीम को फाइनल तक पहुंचाने में तो मदद की, लेकिन फाइनल मैच छोटे नाम के बड़े खिलाड़ियों ने जिताया। मसलन, आदित्य सर्वटे, अक्षय वाखारे और अक्षय कर्णेवर ने। भारत में क्रिकेट अंगरेजी राज के साथ-साथ फैला। कलकत्ता (कोलकाता), मद्रास (चेन्नई), बंबई (मुंबई), दिल्ली...। बीच में एक दौर ऐसा आया, जब क्रिकेट का मायने ही मुंबई हो गया था। रणजी ट्रॉफी राष्ट्रीय चैंपियनशिप है। उसके 41 बार चैंपियन रहे वे। 15 साल तो लगातार। यही दौर था, जब देश की टेस्ट टीम में भी सात-आठ खिलाड़ी मुंबइकर होते थे। महान ऑफ स्पिनर प्रसन्ना की कप्तानी में कर्नाटक की टीम ने पहली बार मुंबई की दादागीरी को तोड़ा। फिर एक और महान स्पिनर बेदी की कप्तानी में दिल्ली ने अपने पंख पसारे। उसके बाद धीरे-धीरे क्रिकेट पूरे देश में फैलने लगा। एक समय कौन कल्पना कर सकता था कि उत्तर प्रदेश, राजस्थान, रेलवे की टीम भी रणजी चैंपियन हो पाएंगी? और अब गुजरात और विदर्भ।     
समाजशास्त्री आशीष नंदी ने अपनी किताब द ताओ ऑफ क्रिकेट  में मजेदार बात कही है, ‘क्रिकेट तो हिन्दुस्तानी खेल है, उसे गलती से अंगरेजों ने खोज लिया।’ उस समय यह पढ़कर लोगों को अजीब लगा था, लेकिन अब उसका मतलब समझ में आ रहा है। अब क्रिकेट सचमुच हिन्दुस्तानी खेल बन गया है। शायद ही देश का कोई कोना हो, जहां इसकी पहुंच न हो। पूर्वाेत्तर की टीमों ने इस बार जिस जज्बे से हिस्सा लिया, वह इसकी पहुंच का गवाह है। अभी तक असम खेलते नजर आता था। लेकिन अब अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, नगालैंड, मिजोरम, सिक्किम और त्रिपुरा की टीमें भी खेल रही हैं। दो दिन पहले टीम इंडिया ने न्यूजीलैंड से जो ट्वंटी-20 खेला था, उसमें छह क्रिकेटर किसी महानगर से नहीं, छोटी-छोटी जगहों से आए थे। यही हाल नेशनल टेस्ट टीम का है। ऑस्टे्रलिया के साथ आखिरी टेस्ट खेलने वाली टीम के कम से कम छह खिलाड़ी छोटे शहरों और कस्बों से थे। एक बात और। ऑस्टे्रलियाई दौरे में हमारे तेज गेंदबाजों ने तो कहर ढा दिया था। इयान चैपल जैसे महान खिलाड़ी ने कहा कि ऐसी फास्ट बॉलिंग उन्होंने देखी ही नहीं। उसे देखकर यदि वेस्टइंडीज के ‘सुपर फास्ट बॉलर’ याद आ जाएं, तो बात ही क्या? भारतीय बॉलिंग में सबसे बड़ा फर्क डाला जसप्रीत बुमराह ने। वह किसी क्रिकेटिंग महानगर से नहीं आए थे, न ही मोहम्मद शमी। इशांत जरूर दिल्ली के थे। रिजर्व वाले भुवनेश्वर व उमेश यादव भी महानगरीय नहीं हैं। बिल्कुल नए खलील अहमद और मोहम्मद सिराज भी नहीं। 
भारतीय क्रिकेट वहां पहुंच रहा है, जहां हम एक वक्त सोच भी नहीं पाते थे। आज हाल यह है कि हम दूरदराज के किसी गांव में बैठकर भी क्रिकेटर बनने का सपना देख सकते हैं। उस सपने को पालने-पोसने के लिए हमें किसी महानगर की जरूरत नहीं है।

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  • Web Title:Editorial Hindustan Column for 8 february