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दीये उम्मीद के  

यह हम सब जानते हैं कि त्योहारों और उत्सवों की जरूरत मानव समाज को इसीलिए पड़ी कि इंसानी जिंदगी की नीरसता टूटे। यही कारण है कि मानव समूह ने जिस किसी धर्म को धारण किया, उसमें बाकायदा इन्हें पिरोया। इन त्योहारों और उत्सवों को तय करने में भौगोलिक स्थितियों और आर्थिक लक्ष्यों की भी खासा भूमिका रही। इस लिहाज से दिवाली भारतीय समाज के सबसे बड़े त्योहारों में से एक है। न सिर्फ कृषक समाज के नजरिये से, बल्कि व्यापारी वर्ग के दृष्टिकोण से भी। सदियों से हम खेती-किसानी से संचालित समाज रहे हैं। यह ठीक है कि भूमंडलीकरण ने हमारी अर्थव्यवस्था की गतिशीलता को कुछ नए पहिए दिए हैं, मगर आज भी किसानों के घर-खलिहानों में नई फसलों की आमद से जब कृषक समाज हुलसता है, तो हमारा बाजार कुलांचे भरता है। फिर इस बार तो किसानों के पास खुश होने और बाजार को नई उम्मीदें बांधने की एक बड़ी वजह भी है। मोदी सरकार ने स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करने की घोषणा की है। कृषि लागत और

मुनाफे के बीच बेहतर संतुलन के लिए इन सिफारिशों के लागू होने की प्रतीक्षा काफी समय से की जा रही थी। दिवाली एक ऐसा त्योहार है, जब गरीब से लेकर अमीर तक अपने घर-परिवार में कुछ न कुछ नया जोड़ने की कोशिश करता है, और इस तरह से पूंजी का प्रवाह बाजार और देश की अर्थव्यवस्था को नई उम्मीदें सौंपता है। चूंकि इससे साफ-सफाई, स्वच्छता की सुखद पारंपरिक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं, इसलिए यह त्योहार गरीब मजदूरों की जेब में भी कुछ न कुछ राशि पहुंचा ही देता है, जिससे वह अपने हिस्से की कुछ खुशियां जी सके और यही दिवाली की खूबसूरती भी है। हमारे लिए सुकून की बात यह भी है कि दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं की हालत आंकने वाली रेटिंग एजेंसियों ने भारतीय अर्थव्यवस्था के पक्ष में लगातार सकारात्मक बातें कही हैं। हाल के दिनों में डॉलर के बढ़ते दाम और पेट्रो-उत्पादों की महंगाई ने चिंताएं बढ़ाई हैं। लेकिन इस बीच ईरान से तेल आयात पर अमेरिकी छूट राहत की खबर लेकर आई है।        

मगर एक खास मोर्चा है, जो दिवाली के हमारे उत्साह को ग्रहण लगाने लगा है। इसके दीयों की रोशनी धुएं की जद में घुटती चली गई, और हम तमाशाई बने रहे। दिल्ली समेत देश के लगभग सभी महानगरों में प्रदूषण से जिंदगी बेहाल है। पर्यावरण विशेषज्ञों व डॉक्टरों की लगातार हिदायतों के बावजूद दिल्ली की हालत चिंताजनक स्तर पर पहुंच चुकी है। ऐसे में, सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले ने एक उम्मीद जगाई है।

सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में अत्यधिक प्रदूषण फैलाने वाले पटाखों के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है। इसे एक सुखद फैसले के तौर पर देखा जाएगा। वैसे भी, दीपावली के साथ यह विडंबना जुड़ती चली गई कि हमने अपने घर-दरवाजे को तो गंदगी से मुक्त कर दिया, मगर अपने आकाश को उससे कहीं ज्यादा गंदगी सौंप दी। स्वच्छता की कोई भी कवायद एकांगी कभी सफल नहीं हो सकती। उसे सर्वपक्षीय बनाना ही होगा। इसलिए भी हमें अपने त्योहारों के मूल संदेश को याद करने की जरूरत है। प्रदूषित माहौल में खुशहाल जिंदगी मुमकिन नहीं। अपनी परंपराओं में घुस आए प्रदूषकों से हमें मुक्ति की राह तलाशनी ही होगी। आखिर दीये जलाने के पीछे का असली पैगाम भी यही है- हमें अंधकार से प्रकाश में ले चलो! 
 

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  • Web Title:editorial hindustan column for 7 november