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मंदिर अब चुनाव के बाद

 

विश्व हिंदू परिषद की तरफ से जो संकेत मिल रहे हैं, वे बताते हैं कि संगठन ने फिलहाल राम मंदिर के निर्माण से हाथ खींचने का फैसला किया है। परिषद के वरिष्ठ नेता सुरेंद्र जैन ने कहा है कि राम मंदिर चुनावी मुद्दा बनता जा रहा था, इसलिए संगठन ने तय किया है कि एक बार जब चुनाव खत्म हो जाएंगे, तो वह अपना आंदोलन फिर से शुरू करेगा। फिलहाल उन्होंने अप्रैल तक आंदोलन को स्थगित रखने की घोषणा की है। हालांकि परिषद ने जो बात कही है, उसके निहितार्थ को उन्हीं शब्दों में स्वीकार करने का कोई कारण नजर नहीं आता। अभी तक धारणा यही थी कि चुनाव ही वह वजह है, जिससे इस मुद्दे को इतनी तूल दी जा रही है। पिछले कुछ सप्ताह से जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं, इस पर हंगामा बढ़ता जा रहा था। यह साफ हो गया था कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले की सुनवाई को लेकर किसी जल्दबाजी में नहीं है। ऐसे में, सरकार से यह मांग की जा रही थी कि वह अध्यादेश लाए और निर्माण के लिए जमीन राम जन्मभूमि न्यास को सौंपे। इस मसले को प्रयागराज में चल रहे कुंभ में भी बड़ा मुद्दा बनाए जाने की तैयारी कर ली गई थी। इसके लिए धर्म संसद का आयोजन भी किया गया था, लेकिन यह धर्म संसद इस मसले पर किसी भी फैसले पर पहुंचने में नाकाम रही। फिर अचानक ऐसा क्या हो गया कि परिषद को अपने कदम वापस खींचने पड़े?
राम जन्मभूमि मसले की शुरू से ही यह समस्या रही है कि जब-जब यह मामला जोर-शोर से उठाया जाता है, इस मुद्दे की और शायद समाज की भी कई जटिलताएं उसी जोर-शोर से सामने आ जाती हैं। इस बार भी यही हुआ। हमेशा की तरह इस बार भी राम जन्मभूमि न्यास का नाम आते ही प्रतिद्वंद्वी दावेदार निर्मोही अखाड़ा सक्रिय हो गया। फिर कुंभ में जब धर्म संसद का आह्वान किया गया, तो शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने न सिर्फ इसके जवाब में परम धर्म संसद का आयोजन कर डाला, बल्कि राम जन्मभूमि के निर्माण के लिए इसी महीने की एक तारीख की घोषणा भी कर दी। जबकि परिषद पर यह दबाव था कि वह मंदिर निर्माण की तारीख घोषित करे, लेकिन वह इससे बचती रही। परिषद जिस संघ परिवार की सदस्य है, उसके मुखिया मोहन भागवत ने धर्म संसद के अपने भाषण में यह संकेत दिया था कि मंदिर निर्माण में अभी वक्त लग सकता है। जाहिर है, फिलहाल आंदोलन को टाल देने की तैयारी पहले से थी। इस पर एक सोच यह भी है कि मंदिर मुद्दे को भारतीय जनता पार्टी को चुनाव में फायदा दिलाने के लिए ही उठाया जा रहा था, लेकिन अब उसे इसके मुकाबले विकास का मुद्दा ज्यादा लाभदायक दिख रहा है, इसलिए वह फिलहाल मंदिर मसले को हाथ नहीं लगाना चाहती। 
सच चाहे जो हो, फिलहाल बड़ी खबर यही है कि आगामी चुनाव में मंदिर मुद्दे पर दांव नहीं खेला जाएगा। अगर विश्व हिंदू परिषद हाथ खींच लेती है, तो इस पर किसी खींचतान की ज्यादा गुंजाइश नहीं रह जाएगी। यह एक तरह से अच्छी खबर भी है कि बड़े पैमाने पर जन मनोविज्ञान से जुड़े मसले पर लोगों से वोट नहीं मांगे जाएंगे। इसका एक अर्थ यह भी हो सकता है कि चुनाव में जनता के जीवन से जुड़े मसले ही महत्वपूर्ण रहेंगे। और जहां तक अयोध्या के राम मंदिर का मामला है, तो सभी पक्षों को पहले सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार करना चाहिए।

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  • Web Title:Editorial Hindustan Column for 7 february