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सोने की खरीद

सोमवार को धनतेरस था, खरीदारी का दिन। इस दिन सबसे ज्यादा खरीदारी बर्तनों की होती है, उसके बाद आता है नंबर सोने का। इस दिन जो सोना नहीं खरीद पाते, वे उम्मीद और चाहत के साथ अगले धनतेरस का इंतजार करते हैं। मुहल्ले में चर्चा यही होती है कि किसने क्या और कितना सोना खरीदा? इस बार धनतेरस के दिन यह चर्चा करने वालों में एक और नाम जुड़ गया- वल्र्ड गोल्ड कौंसिल का। कौंसिल ने सोने की खरीदारी के तिमाही आंकड़े संयोग से धनतेरस के दिन ही जारी किए। हमारे लिए इसमें सुखद आश्चर्य यह था कि पिछली तिमाही यानी जुलाई से सितंबर तक अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की सबसे ज्यादा खरीदारी करने वालों में भारतीय रिजर्व बैंक भी था। रिजर्व बैंक ने इस तिमाही में करीब 13.7 टन सोना खरीदा। रिजर्व बैंक ने सोने की खरीदारी को किस तेजी से बढ़ाया है, इसे इससे भी समझा जा सकता है कि पिछले नौ महीनों में उसने 21.8 टन सोना खरीदा है, जो बताता है कि पिछली तिमाही में खरीदारी कितनी तेजी से हुई है। इस तिमाही में दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों ने कुल 148 टन सोना खरीदा है, यानी इस खरीदारी में भारत की हिस्सेदारी दस फीसदी से थोड़ी ही कम रही है। भारतीय रिजर्व बैंक का स्वर्ण भंडार इस समय 566 टन है। स्वर्ण भंडार के लिहाज से भारत का रिजर्व बैंक काफी पीछे है। यहां तक कि स्विट्जरलैंड और तुर्की जैसे छोटे देशों के स्वर्ण भंडार भारत के मुकाबले काफी बड़े हैं। हालांकि यह भी माना जाता है कि आम भारतीयों के पास जितना सोना है, अगर वह सब जोड़ लिया जाए, तो भारत का स्वर्ण भंडार शायद दुनिया में सबसे बड़ा हो जाएगा।
दुनिया भर के केंद्रीय बैंक और यहां तक कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी संस्थाएं सोने के भंडार बनाकर क्यों रखती हैं? उसी कारण से, जिस वजह से भारत में मध्यवर्गीय लोग यथासंभव सोना खरीदकर अपने पास रखने की कोशिश करते हैं। एक तो किसी देश के केंद्रीय बैंक का स्वर्ण भंडार उस देश की आर्थिक ताकत का प्रतीक होता है, दूसरे यह ऐसी संपत्ति होती है, जो गाढे़ वक्त में काम आए। नगदी धन की बहुत सी सीमाएं होती हैं। मुद्राएं कारोबार समीकरणों और विश्व राजनीति की खींच-तान में उतरती-चढ़ती रहती हैं। यहां तक कि वे मुद्राएं भी, जिन्हें हम हार्ड करेंसी कहते हैं। बेशक सोना भी सुरक्षित नहीं है, लेकिन उसके उतार-चढ़ाव में झटके उतने ज्यादा नहीं होते। फिर केंद्रीय बैंक आरक्षित संपदा के रूप में सिर्फ सोने या सिर्फ मुद्रा पर निर्भर रहने का जोखिम नहीं उठाते, वे एक साथ दोनों में ही निवेश करते हैं। सोना जिस तरह से गाढे़ वक्त में लोगों के काम आता है, उसी तरह वह राष्ट्रों के भी काम आता है। याद कीजिए, पहले खाड़ी युद्ध का वह दौर, जब भारत का विदेशी मुद्रा कोष लगभग खाली हो गया था। तब रिजर्व बैंक ने सोना गिरवी रखकर ही विदेशी मुद्रा का इंतजाम किया था।
भारत ही नहीं और कई देशों के केंद्रीय बैंक भी इस समय विश्व बाजार से सोना खरीद रहे हैं। हालांकि एक कारण यह भी है कि पिछले कुछ समय में सोने के भाव थोड़ा नीचे आए हैं। इस समय दुनिया भर में जो कारोबारी माहौल है, उसमें लगभग सभी देशों को सोना खरीदने की जरूरत महसूस हो रही है। इसलिए भारत का रिजर्व बैंक जो सोना खरीद रहा है, उसे रुपये की गिरती कीमत और पेट्रोलियम बाजार की उथल-पुथल से भी जोड़कर देखना होगा।

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  • Web Title:Editorial Hindustan Column for 6 november