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पटरी पर नहीं रफ्तार

यह न शीतकाल है कि पटरियां चटकने लगें, न कोहरा है कि परिचालन में बाधा आए, न किसी हादसे का असर है, तो फिर भारतीय रेल की रफ्तार इस कदर पटरी से उतरी क्यों है? टे्रन परिचालन नियंत्रण कक्ष भी तस्दीक कर रहे हैं कि बीते कई दिनों से दिल्ली आने या दिल्ली से जाने वाली तमाम ट्रेनें अप्रत्याशित विलंब से चल रही हैं। राजधानी और शताब्दी भी अपवाद नहीं रहीं। जयनगर-दिल्ली के बीच चलने वाली स्वतंत्रता सेनानी एक्सप्रेस तो 30 घंटे से भी ज्यादा विलंब से चली। रही सही कसर स्टेशनों के उद्घोषणा तंत्र और ऑनलाइन सिस्टम की अराजकता पूरी कर दे रही है, जहां न तो असल सूचना प्रसारित हो रही है और न वांछित जानकारी मिल पा रही है। ट्रेन की लोकेशन बताने वाला ऑनलाइन ट्रैकिंग सिस्टम भी बेअसर है। संतोषजनक जवाब तो खुद रेलवे विभाग भी नहीं दे पा रहा।

ट्रेनें पहले देर से नहीं चलती थीं, ऐसा भी नहीं है। लेकिन अभी जो हो रहा है, वह अप्रत्याशित है। संयोग ही है कि दो साल पहले रेल बजट का अलग से आना बंद हुआ और बीते एक-डेढ़ साल में रेल यात्राएं बद से बदतर होती गई हैं। दुर्घटनाएं शायद कम हुई हों, खान-पान से लेकर साफ-सफाई और अन्य सुविधाओं के सवाल तीखे होते गए हैं। डाइनेमिक प्राइसिंग के इस दौर में भी राजधानी और शताब्दी जैसी ट्रेनों में खान-पान व अन्य सुविधाएं बदहाल हुई हैं, तो सामान्य ट्रेनों की कल्पना ही की जा सकती है। रेल बजट को आम बजट में समाहित करने के पीछे तर्क था कि अलग बजट रेलवे को लोक-लुभावन घोषणाओं और उन्हें पूरा करने में ही उलझा देता है, ढांचागत और यात्री सुविधाओं पर ध्यान नहीं देने देता, लेकिन अब तक जो सामने आया है, वह उस सोच और भावना के बिल्कुल विपरीत है। लेट-लतीफी रेलवे की तमाम खामियों में से एक भले हो, लेकिन वह ऐसी खामी है, जिसका सीधा और दिखने वाला असर पड़ता है। ऐसे में सवाल उठेंगे ही।

गरमी की छुट्टियां नहीं हुई हैं, तब यह हाल है। जिम्मेदार लोग बता रहे हैं कि ट्रेन परिचालन के बढ़े हुए दबाव में जगह-जगह रखरखाव का असर परिचालन यानी समयबद्धता पर पड़ा है। तो क्या मान लिया जाए कि छुट्टियों में विशेष ट्रेनों का बोझ अधिक बढ़ने के साथ यह मुश्किल और बढे़गी? एक और जरूरी सवाल कि लेट-लतीफी का सबसे ज्यादा असर बिहार से गुजरने वाली ट्रेनों पर ही क्यों? यह सवाल इसलिए भी, क्योंकि ऑनलाइन टै्रवल पोर्टल रेलयात्री  का सर्वे भी बताता है कि बिहार जाने या उससे गुजरने वाली टे्रनों का हाल सबसे बुरा है, जबकि गुजरात सबसे बेहतर। एक करोड़ से भी ज्यादा मासिक उपभोक्ता का दावा करने वाले पोर्टल के अनुसार, बीते दो वर्षों में बिहार, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड सहित कई राज्यों में ट्रेनों की लेट-लतीफी बढ़ी है। यही रफ्तार रही, तो वह दिन दूर नहीं, जब स्टेशनों पर ट्रेनों का औसत विलंब दो घंटे से भी ज्यादा होगा और आने वाली सर्दियों में तो संभव है कि रद्द होने का ग्राफ चढे़ और चंद ट्रेनें ही पटरी पर दौड़ती दिखें या फिर स्टेशनों का ऐसा बुरा हाल हो जाए कि लूप लाइन भी शायद ही खाली दिखाई दें। चिंता की बात है कि ट्रेनों की अराजकता से त्रस्त लोग जिस तरह हवाई और अन्य यात्रा विकल्पों की ओर उन्मुख होते दिखे हैं, कहीं आने वाले वक्त में यह सड़कों पर भारी बोझ के रूप में न दिखाई दे।

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  • Web Title:Editorial Hindustan Column for 5 may