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हर घर की कहानी

सुबह ही इसकी शुरुआत होती है और अक्सर सोने से पहले तक यह चलती रहती है। परिवारों में बहस, जिसे अभिभावक अक्सर बहस नहीं, बेवजह की सिर खपाई मानते हैं, तकरीबन हर रोज ही होती है। यह कोई नई बात भी नहीं है, शायद हमेशा से ही ऐसा होता रहा है। यह सबसे ज्यादा होती है बच्चों और अभिभावकों के बीच। शायद इसका एक बड़ा कारण पीढ़ियों का अंतर भी है। सोच, समझ और प्राथमिकताओं का अंतर उन्हें आपस में उलझा ही देता है। वे सब, जिनका बचपन अपने मां-बाप से बात-बात पर उलझने में बीता था, अब अपने बच्चों के तर्क-वितर्क को लेकर परेशान रहते हैं। समय बदल गया, उनकी भूमिका भी बदल गई, समस्या को देखने का नजरिया भी बदल गया, लेकिन समस्या बरकरार है। इस तरह की उलझनें तकरीबन हर घर में अक्सर ही पैदा होती हैं, लेकिन यह सबसे ज्यादा दिखती हैं खाने की मेज पर। खाने के मामले में बच्चों की पसंद और नापसंद काफी पक्की सी होती है, जो चीज उन्हें नहीं पसंद है, उसे वे नहीं खाएंगे, किसी भी तरह। इस मामले में मां-बाप की प्राथमिकता जहां सेहत और भोजन का संतुलन होता है, वहीं बच्चों की प्राथमिकता सिर्फ और सिर्फ स्वाद होती है। कुछ लोग मानते हैं कि यह उलझन अब ज्यादा बढ़ गई है, क्योंकि अब बच्चों के सामने घर और बाहर खाने के विकल्प काफी ज्यादा बढ़ गए हैं। 
बच्चे और अभिभावक आपस में कितना उलझते हैं, जर्मनी की पैक्ड जूस बेचने वाली कंपनी कैप्री-सन ने इसे जानने के लिए एक विस्तृत अध्ययन ही कर डाला। और जो नतीजे मिले, वे काफी दिलचस्प हैं। अध्ययन इस आकलन पर पहुंचा कि अभिभावक अपने बच्चों से एक साल में औसतन 2,184 बार उलझते हैं। यानी एक महीने में 182 बार, एक हफ्ते में 42 बार या यूं कहें कि हर रोज औसतन छह बार। यह भी पाया गया कि मां-बाप अपने बच्चे को समझाने में हर रोज औसतन 16 मिनट खर्च करते हैं। दूसरा नतीजा यह निकला कि ऐसे झगड़े अक्सर भोजन के समय ही होते हैं। एक और मौका वह भी होता है, जब बच्चा मुंह में चॉकलेट डालकर बिस्तर में जाना चाहता है। ऐसे ज्यादातर मामलो में आखिर में मां-बाप को ही बच्चे की जिद के आगे हार माननी पड़ती है। उन्हें लगता है कि घर में सब खुश रहें, इसके लिए उनका समझौता करना ही ठीक है। शायद एक कारण यह भी है कि उनके पास कोई और विकल्प भी नहीं होता। 
ये शोध किसी विश्वविद्यालय या प्रतिष्ठित संस्थान का नहीं है, इसलिए हो सकता है कि अकादमिक जगत में इसे ज्यादा महत्व न मिले। इसके अलावा यह शोध एक ऐसी कंपनी ने भी करवाया है, जो बच्चों के खाने-पीने के सामान का ही कारोबार करती है, इसलिए भी इसके मकसद पर सवाल उठाए जा सकते हैं। हमें पता नहीं कि यह शोध बाकी किन नतीजों पर पहुंचा, लेकिन जो नतीजे पेश किए गए हैं, वे काफी दिलचस्प हैं और वे हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा हैं, इसलिए हमें ये बहुत गलत भी नहीं लगते। लेकिन यहीं पर हमें एक दूसरी चीज पर भी ध्यान देना होगा। यह पूरा शोध यूरोप में वहां एक अभिभावकों और बच्चों को लेकर हुआ है, लेकिन जब यहां हम उसके नतीजों को देखते हैं, तो वे हमें अपनी ही कहानी लगते हैं। यानी यह समस्या किसी एक देश या संस्कृति की नहीं, पूरी दुनिया की है। पीढ़ियों का अंतर हमारे पूरे मानव समाज का ही एक सच है।

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  • Web Title:Editorial Hindustan Column for 30 july