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उम्मीद की उड़ान  

जिस जट्रोफा को अभी हम तक उतनी गंभीरता से नहीं ले पाए थे, उसी के बीज से निकले तेल के जरिए जबर्दस्त ईंधन क्रांति हुई और भारत प्रदूषण मुक्त उड़ान भरने वाले देशों की सूची में शामिल हो गया। बॉयो फ्यूल मिले एविएशन टरबाइन फ्यूल से संभव हुई स्पाइस जेट की इस पहली देहरादून-दिल्ली प्रायोगिक उड़ान ने भारत को अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा जैसे देशों के साथ उस पंक्ति में खड़ा कर दिया है, जहां से जैव ईंधन निर्भरता वाली प्रदूषण-मुक्त वैमानिकी की राह खुलती है। प्रयोग व्यावसायिक स्तर पर सफल रहा और अन्य विमानन कंपनियों ने भी इसे इसी तरह अपनाया, तो यह भारत की अरब देशों पर तेल निर्भरता को कम करने में तो सहायक होगा ही, कार्बन उत्सर्जन में 80 फीसदी तक कमी लाकर अपने आकाश को साफ करने में भी मददगार होगा। दुनिया के प्रदूषण में दो फीसदी हिस्सेदारी सिर्फ विमानन कंपनियों की है, जिसे ऐसे प्रयोगों से काफी हद तक कम किया जा सकता है। 

यह जैव ईंधन आत्मनिर्भरता के सपने की पहली सफल उड़ान भी है और भारतीय विमानन सेवा में नई क्रांति का आगाज भी। यह पर्यावरण व उड़ान लागत, दोनों को संभालने में मददगार है, तो बंजर में सिर पकड़कर बैठे किसानों के लिए भी उम्मीद की बड़ी किरण है, क्योंकि जट्रोफा की खेती कम पानी और बंजर इलाकों में आसानी से हो सकती है। यानी अगर सब कुछ सही दिशा में चले और इसकी खेती को वैज्ञानिक तरीके से बढ़ावा दिया जाए, तो आने वाले वक्त में यह सल्फर और नाइट्रोजन रहित ईंधन के रूप में डीजल का एक कारगर विकल्प बनकर हमारे शहरी पर्यावरण और अर्थव्यवस्था, दोनों पर छाई धुंध छांटने में भी मददगार हो सकता है। यह भारतीय पेट्रोलियम संस्थान और वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद की कई वर्षों की मेहनत और अनुसंधान का नतीजा ही है कि जट्रोफा तेल के इस्तेमाल से इसने वह राह खोली है, जो एक साथ विमानन कंपनियों और किसानों, दोनों को राहत देने वाली है। तेल के बढ़ते दामों और लगातार महंगी होती विमान सेवाओं के इस दौर में यह कंपनियों के साथ आम उपभोक्ता के लिए भी उत्साहवर्द्धक खबर है, क्योंकि इस प्रयोग का विस्तार भविष्य में उड़ानों पर कंपनियों का ईंधन खर्च घटाकर आधा कर सकता है, जिसका सीधा लाभ घटे किराए के रूप में यात्रियों को मिलेगा। 

इससे एक साथ कई काम हुए हैं। जेट्रोफा की खेती ने अभी तक भले ही हमें न लुभाया हो, ऐसे प्रयोगों की व्यावसायिक सफलता से इसे पंख लगते देर नहीं लगेगी। मानना होगा कि आयात विकल्प, कम लागत और किसानों को सीधे लाभ पहुंचाने वाले बायोफ्यूल का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल समय की मांग है, और हमें विमानन कंपनियों ही नहीं, अन्य तमाम संयंत्रों-उद्योगों में भी इसके इस्तेमाल की जमीन तैयार करनी होगी। बायोजेट फ्यूल को अमेरिकी मानक परीक्षण प्रणाली की मान्यता हासिल है और यह विमान में प्रैट ऐंड व्हिटनी तथा बॉम्बार्डियर के व्यावसायिक मानदंडों पर भी खरा उतरता है। वायु सेवाओं की वजह से होने वाले प्रदूषण को ऐसे प्रयोगों से कम से कम आधा तो किया ही जा सकता है। जौलीग्रांट से पालम की इस प्रायोगिक उड़ान ने न सिर्फ उड़ान के आकाश में नया अध्याय जोड़ा है, बल्कि घाटे में डूबी भारतीय विमानन कंपनियों के लिए उबरने का एक सूत्र भी दिया है।

 

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  • Web Title:editorial hindustan column for 29 august