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विद्युत संकट का भूगोल

 

तरक्की को मापने के पैमाने हर युग में अलग-अलग रहे हैं। जब दुनिया भर में औद्योगिक क्रांति फैल रही थी, तो कोई देश कितनी तरक्की कर रहा है, यह इससे मापा जाता था कि वहां इस्पात की खपत कितनी है? आज के दौर में यह इससे नापा जाता है कि किस देश में ऊर्जा की प्रति व्यक्ति उपलब्धता और प्रति व्यक्ति मांग कितनी है? हमारे देश में इसकी मांग उपलब्धता से कहीं ज्यादा और कहीं बहुत ज्यादा रही है। खासकर विद्युत ऊर्जा के मामले में, जिसे हम विद्युत संकट कहते हैं, वह और कुछ नहीं, मांग व उपलब्धता के इसी अंतर का नतीजा भर है। कोई भी संकट सिर्फ संकट नहीं होता, उससे बहुत सारी चीजें जुड़ जाती हैं। जैसे विद्युत संकट से जुड़ी हुई हैं पारेषण और वितरण की हानि, पूरी व्यवस्था का भ्रष्टाचार और विद्युत चोरी की घटनाएं। संकट जितना गहरा होता है, ये सारी समस्याएं भी उतनी ही विकट हो जाती हैं। इस उपलब्धता, मांग के अंतर और इन सारी समस्याओं की एक और बात यह है कि ये पूरे देश में समान नहीं हैं। इस संकट का एक भूगोल भी है और यही सबसे ज्यादा परेशान करने वाली बात है। यह सिर्फ समस्या को नहीं, उत्तर और दक्षिण के बढ़ते अंतर को भी बताता है। यह भी बताता है कि विकास और मानव विकास सूचकांक की स्थिति हर जगह अलग-अलग क्यों है?
इसी अंतर का एक दिलचस्प पहलू है विद्युत कटौती के आंकड़े। ऊर्जा मंत्रालय ने हाल ही में देश भर में होने वाली विद्युत कटौती के जो आंकड़े पेश किए हैं, उनसे यह अंदाज लगाया जा सकता है कि उत्तर और दक्षिण के राज्य विद्युत के मामले में भी दो अलग-अलग छोर पर क्यों हैं। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में एक महीने में सिर्फ साढ़े चार घंटे बिजली गुल रहती है, जबकि झारखंड में 96 घंटे यानी पूरे चार दिन। इस मामले में उत्तर प्रदेश और बिहार अपने आप को झारखंड से बेहतर तो मान सकते हैं, लेकिन दक्षिण के राज्यों के मुकाबले वे काफी पीछे हैं। बिजली गुल होने के मामले भी दक्षिण के राज्यों में उत्तर के मुकाबले काफी कम हैं। अगर सिर्फ मई 2018 के आंकड़ों को ही लें, तो केरल में इस दौरान बिजली गुल होने की औसतन घटनाएं 1.8 थीं, जबकि उत्तर प्रदेश में ये 6.53 थीं, बिहार में 28, उत्तराखंड में 51, तो झारखंड में 93। लेकिन सबसे दिलचस्प हैं बिजली की चोरी के आंकड़े। दक्षिण के राज्यों में बिजली चोरी की घटनाएं उत्तर के राज्यों की तुलना में बहुत कम हो रही हैं। 
विद्युत के ये आंकड़े हमें तब मिले, जब इन दिनों उत्तर बनाम दक्षिण की एक ऐसी बेवजह बहस चल रही है, जिसकी हमें जरूरत नहीं है। विकास, शिक्षा और स्वास्थ्य के आंकड़ों के साथ यह बताया जा रहा है कि उत्तर के राज्य दक्षिण के राज्यों के मुकाबले कितने पिछड़े हैं। इसी के साथ आबादी के आंकड़े भी पेश किए जा रहे हैं, जिनसे पता चलता है कि उत्तर के राज्य बढ़ती आबादी पर नियंत्रण के मामले में दक्षिण से कितना पीछे हैं। कई जगह इसी को उत्तर के पिछड़ेपन का कारण भी बताया जा रहा है। ये आंकड़े ठीक हो सकते हैं, लेकिन यह बहस कहीं ले जाने वाली नहीं हैं। मूल बात यह है कि दक्षिण के राज्य जहां पहुंच गए हैं, वहां तक जाना उत्तर के राज्यों का पहला लक्ष्य बनना चाहिए। जरूर है कि दक्षिण आगे बढ़ने के मामले में उत्तर की प्रेरणा बनें और फिर सारे राज्य मिलकर आगे जाने के लिए स्पद्र्धा करें। राज्य उत्तर के हों या दक्षिण के, सभी को अभी और आगे जाना है।

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  • Web Title:Editorial Hindustan Column for 28 june