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हार्दिक पटेल को सजा

गुजरात की एक अदालत ने पाटीदार समुदाय के नेता हार्दिक पटेल को दो साल की सजा सुनाई है। यह मामला तीन साल पुराना है, जब हार्दिक पाटीदार या पटेल समुदाय को आरक्षण देने की मांग पर अपना आंदोलन चला रहे थे। उन पर आरोप यह है कि उन्होंने भीड़ के साथ एक विधायक के कार्यालय पर हमला बोला और इस घटना में हिंसा हुई। उस आंदोलन के दौर के इसके अलावा भी बहुत सारे मामले हार्दिक के खिलाफ चल रहे हैं, जिनमें से कुछ मामले तो देशद्रोह तक के हैं। लेकिन अभी जो फैसला आया है, उसका महत्व उसके मौके की वजह से बढ़ गया है। इस समय हार्दिक पटेल अपने आंदोलन में फिर से नई जान फूंकने या यूं कहा जाए कि देश और प्रदेश की राजनीति में फिर से प्रासंगिक बनने की तैयारी कर रहे थे। इसके लिए चंद रोज बाद ही अनशन शुरू करने का उन्होंने एलान भी कर दिया था। जाहिर है, जिस समय हार्दिक फिर से सुर्खियों में आने की कोशिश कर रहे थे, इस फैसले ने उन्हें कुछ अतिरिक्त सुर्खियां सौंप दी हैं। इस फैसले के बाद हार्दिक यह कहते हुए शहीद बनने की कोशिश कर सकते हैं कि आंदोलन के कारण झूठे मामलों में फंसाया जा रहा है। दूसरी तरफ, गुजरात की भाजपा सरकार यह तर्क दे सकती है कि इस फैसले से हार्दिक पटेल की असलियत सामने आ चुकी है। हार्दिक और सरकार में कौन इस फैसले को ज्यादा अच्छी तरह भुना पाता है, यह देखना अभी शेष है।
लेकिन इस फैसले से हार्दिक की राजनीति के लिए कोई बाधा खड़ी हो जाएगी, यह उम्मीद बहुत कम है। भारतीय राजनीति का जो पैटर्न है, उसमें ऐसी सजाएं किसी नेता के पांव की बेड़ी नहीं, बल्कि अक्सर उसके गले का हार बन जाती हैं। कोर्ट द्वारा फैसला सुनाए जाने के बाद हार्दिक पटेल की जो प्रतिक्रिया मिली है, वह यही बताती है कि गुजरात के पटेल समुदाय के इस युवा नेता ने फैसले को अपनी राजनीति चमकाने के अवसर के रूप में ही लिया है। हार्दिक जो आंदोलन शुरू करने जा रहे थे, उसे 2019 के आम चुनाव की उनकी तैयारियों से जोड़कर देखा जा रहा था। चुनाव से पहले ऐसे आंदोलनों के दो मकसद होते हैं। एक तो चुनाव तक अपने समुदाय के मतदाताओं को अपने साथ जोडे़ रखना और दूसरा, अपने विरोधियों के खिलाफ माहौल को गरमाना। हार्दिक पटेल ने अभी तक यही राजनीति की है, और गुजरात सरकार ने भी उनके खिलाफ तरह-तरह की कार्रवाइयां करके अप्रत्यक्ष रूप से उनका सहयोग ही किया है। खबर है कि हार्दिक लोकसभा चुनाव भी लड़ सकते हैं, और इसी हिसाब से वह इस फैसले को भुनाना भी चाहेंगे।
चुनावी राजनीति से अलग हमें आरक्षण आंदोलनों पर भी ध्यान देना होगा। महाराष्ट्र में मराठा समुदाय का आरक्षण आंदोलन इन दिनों काफी उग्र है। राजस्थान के गुर्जर नेता भी आरक्षण की ताल ठोकने लग गए हैं। जाटों के आरक्षण का मुद्दा भी जोर पकड़ने वाला है, इसके लक्षण नजर आने लगे हैं। हार्दिक पटेल तो खैर पहले ही घोषणा कर चुके हैं। मुमकिन है कि यह सब 2019 के चुनाव की तैयारियों के लिए ही हो, लेकिन इन मांगों के पीछे उन जातियों का जनसमुदाय भी जुड़ा है, जो कभी हरित क्रांति की अगुवा थीं और आज कृषि के घाटे का कारोबार हो जाने से परेशानी में हैं। बेशक, सरकार ने उनकी परेशानियां दूर करने के कुछ कदम उठाए हैं, लेकिन अभी बहुत कुछ किया जाना शेष है।

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  • Web Title:Editorial Hindustan Column for 26 july