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मदद का देश

केरल की भयावह त्रासदी पर विदेशी मदद के सवाल ने नई बहस छेड़ दी है। एक सिरा आपदा के मामले में केंद्र के विदेशी सहायता लेने से इनकार का है, तो दूसरा राज्य सरकार का है, जो इसके पक्ष में है। केंद्र ने व्यवस्थाओं का हवाला देकर राहत लेने से इनकार किया है, तो राज्य सरकार इसे केरल वासियों की भावनाओं से जोड़कर देख रही है। सच है कि केरल के लोगों का आधुनिक अमीरात के निर्माण में बड़ा योगदान है। यूएई में काम करने वाले करीब 30 लाख भारतीयों में से 80 फीसदी केरल के हैं और वे यूएई को अपना ‘दूसरा घर’ मानते हैं। उनकी नजर में आम विदेशी सहायता और यूएई की सहायता में अंतर किया जाना चाहिए। हालांकि संयुक्त अरब अमीरात के 700 करोड़ देने के प्रस्ताव पर ही बाद में संशय दिखा, जब खुद अमीरात सरकार ने माना कि वास्तविक राहत राशि तो अभी तय ही नहीं है। यानी कुछ-कुछ ‘सूत न कपास, जुलाहों में लट्ठम लट्ठ’ जैसी बात हो गई। खैर, यहां मुद्दा राहत राशि नहीं, हमारी अपनी आपदाओं के वक्त विदेशी मदद लेने, न लेने यानी आत्मनिर्भरता का है। नहीं भूलना चाहिए कि बीते डेढ़-दो दशकों में भारत की स्थिति याचक से बदलकर दाता की हो चुकी है और इसने गरीब देश हैती से लेकर विकसित जापान तक की मुक्त हस्त से मदद की है। 

सही है कि 2015 की राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन नीति के अनुसार, ‘किसी अन्य देश की सरकार स्वैच्छिक रूप से आपदा पीड़ितों से एकजुटता दिखाते हुए सद्भावना के तौर पर सहायता देना चाहे, तो स्वीकार किया जा सकता है।’ लेकिन यह भी सही है कि यह एक व्यवस्था है और आत्मनिर्भरता के आधार पर मदद स्वीकार करना या न करना हमारे आत्मबल का मामला है, जिसमें बहस की बहुत गुंजाइश नहीं। यह अंतरराष्ट्रीय मंचों पर छवि बनाने का अवसर भी है, जब हम गर्व से कह सकते हैं कि आत्मबल और आत्मनिर्भरता के भरोसे हम वह सब कर सकते हैं, जिसकी ऐसे वक्त में दरकार है।

सच है कि केरल अपने सौ साल के इतिहास की सबसे भयावह प्राकृतिक आपदा झेल रहा है, जिससे उबरने में इसे वक्त लगेगा। राज्य ने इससे उबरने के लिए 2,200 करोड़ की मदद मांगी है। ऐसे में अगर केंद्र यूएई की सहायता से इनकार करता है, तो उसे यह भरपाई नैतिक रूप से करनी होगी। केंद्र ने फिलहाल केरल के लिए 600 करोड़ की राहत की घोषणा की है, जो नाकाफी मानी जा रही है। केंद्र विदेशी सहायता के मामले में 2004 में सुनामी के बाद के उस फैसले की याद दिला रहा है, जिसमें तत्कालीन सरकार ने विदेशी मदद लेने से यह कहकर विनम्रता से इनकार कर दिया था कि भारत अब आत्मनिर्भर हो चुका है। बाद में 2013 में उत्तराखंड की आपदा के मामले में भी भारत ने अमेरिका और जापान, दोनों से ही इसी आधार पर सीधी मदद लेने से इनकार किया था। यह दरअसल देश की आर्थिक आत्मनिर्भरता और आत्मबल का मामला है, जिसका सम्मान होना चाहिए। लेकिन यह नजर भी रखनी होगी कि सरकार के इनकार के बाद मदद का यह सिलसिला कोई और रास्ता न तलाश ले, जो किसी ऐसी गली में खुल जाए, जिसकी शिनाख्त संभव न हो। सच तो यह है कि इस मामले में एक ऐसे स्पष्ट कानून की दरकार है, जिसकी अपनी-अपनी व्याख्या तो संभव न ही हो, जो नैतिक और वित्तीय आधार पर भी हितकारी हो। 

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  • Web Title:editorial hindustan column for 24 august