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क्रूर नीति

कहते हैं कि राजनीति और प्रशासन का सबसे क्रूर चेहरा बच्चों के प्रति उसके बर्ताव से ही सामने आता है। यही इन दिनों अमेरिका में दिख रहा है। अमेरिका में अवैध ढंग से प्रवास के लिए आए लोगों के पिंजरों में रखे गए बच्चों की तस्वीरें दुनिया भर के अखबारों में छपीं, तो ट्रंप सरकार कठघरे में खड़ी हो गई। इसके साथ ही ट्रंप सरकार की उस सेपरेशन यानी अलगाव नीति पर चर्चा होने लगी, जो पिछले वर्ष जुलाई से लागू हुई है। इस नीति के अनुसार, अमेरिका में बिना वैध कागजों के आने वाले सभी लोगों को सबसे पहले अपराधी घोषित करके जेल में डाल दिया जाता है, उन लोगों को भी, जो अमेरिका में शरण पाने के लिए आते हैं। साथ ही उनके बच्चों को उनसे अलग कर दिया जाता है, जिनमें डेढ़ साल की उम्र तक के छोटे बच्चे भी शामिल हैं। उन्हें लावारिस बच्चों की उस श्रेणी में डाल दिया जाता है, जो कभी-कभार भटककर सीमा पार पहुंच जाते हैं। अब अमेरिकी अधिकारी भले ही यह कह रहे हों कि इन बच्चों की देख -रेख के लिए पूरे इंतजाम हैं, लेकिन दुनिया भर में इसे क्रूरता बताते हुए इसकी खासी आलोचना हो रही है। यहां तक कि पोप ने भी इसे क्रूरता बताया, और तो और खुद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की पत्नी तक ने इसे गलत ठहराया।
तमाम आलोचनाओं के दबाव में ट्रंप ने यह नीति वापस तो ले ली है, लेकिन अपने ही अंदाज में। उन्होंने इसका आरोप विपक्षी दल डेमोक्रेटिक पार्टी पर लगाया। तर्क यह था कि वह अवैध अप्रवासियों पर व्यापक नीति बनाना चाहते थे, लेकिन विपक्ष ने इसके लिए सहयोग नहीं दिया। हालांकि उन्होंने इस पर कोई सफाई नहीं दी कि सहयोग न देने का अर्थ सेपरेशन नीति कहां से था? इस सेपरेशन नीति की वजह से ट्रंप सरकार की आलोचना होनी भी चाहिए, लेकिन एक सच यह भी है कि बिना वैध कागजात के आने वाले अप्रवासियों को लेकर अमेरिका में असहिष्णुता लगातार बढ़ती जा रही है। ऐसे लोगों से सख्ती बरतने और क्रूरता से पेश आने की दलीलें लगातार दी जा रही हैं। कई ऐसे उग्र संगठन भी सक्रिय होते दिख रहे हैं, जिनका कहना है कि अमेरिका का फिर से गोरे, यानी यूरोपीय वंशजों का देश बनाना है। यह भी माना जाता है कि अमेरिका के जनमानस में आए इस चरमपंथी रुझान ने ही दरअसल डोनाल्ड ट्रंप को सत्ता तक पहुंचाया है। सेपरेशन नीति को उसका एक उदाहरण भर माना जा रहा है।
वैसे कहीं न कहीं यह समस्या पूरी दुनिया की ही है। तमाम देशों में ऐसे कई छोटे-मोटे चरमपंथी संगठन मुखर होने लगे हैं, जो सरकारों पर अपनी उस परंपरागत उदारता को त्यागने का दबाव बना रहे हैं, जो लोकतंत्र और आधुनिक सोच की सबसे मजबूत पहचान हुआ करती थी। दिक्कत यह है कि कई मामलों में सरकारें इनके दबाव में आ भी रही हैं। इसके लिए हमारे पास सिर्फ अमेरिका का उदाहरण नहीं है, ब्रिटेन में ब्रेग्जिट आंदोलन के पीछे भी यही सोच देखी जा रही है। वह उदारता, जो दुनिया को कई तरह से जोड़ती थी, या पूरी दुनिया को एक नजर से देखने की प्रेरणा बनती थी, पिछले कुछ समय से विदा हो रही है। दूसरे देशों और दूसरी जातीयताओं के लोगों के प्रति लगातार बढ़ती नफरत इसी का नतीजा है। चंद कड़ी आलोचनाओं के बाद राष्ट्रपति ट्रंप तो अपनी नीति वापस लेने के लिए मजबूर हो गए, लेकिन इस प्रवृत्ति से छुटकारा पाना इतना आसान नहीं होगा।

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  • Web Title:Editorial Hindustan Column for 22 june