Editorial Hindustan Column for 21 january - परीक्षा और प्रेरणा DA Image
17 फरवरी, 2020|9:54|IST

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परीक्षा और प्रेरणा

 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सोमवार को एक बार फिर छात्रों से मिले। मौका था परीक्षा पर चर्चा का। सालाना परीक्षा से पहले छात्रों से मिलने का यह सिलसिला उन्होंने 2018 में शुरू किया था और उनके दूसरे कार्यक्रमों की तरह यह कार्यक्रम भी खासा चर्चा में रहा। जाहिर है, इस साल भी सरकार, पार्टी और खुद प्रधानमंत्री भी इस मौके को भला क्यों छोड़ना चाहते? इसके लिए पिछले कई सप्ताह से तैयारियां चल रही थीं। देश भर में छात्रों, शिक्षकों और अभिभावकों से सवाल और सुझाव मंगाए गए थे। पिछले साल इस कार्यक्रम के लिए देश भर से 1.4 लाख प्रविष्टियां आई थीं, जबकि इस साल उनकी संख्या बढ़कर 2.6 लाख हो गई। यह बताता है कि इस कार्यक्रम की लोकप्रियता बढ़ी है। कार्यक्रम की रूपरेखा बहुत सीमित है- परीक्षा दे रहे बच्चों को अच्छी तैयारी और बेहतर प्रदर्शन के लिए प्रेरित करना। यह ठीक है कि देश की शिक्षा व्यवस्था में तमाम समस्याएं हैं, ढेर सारी जटिलताएं हैं, खुद परीक्षा व्यवस्था में ही बड़े बदलाव की चर्चा न जाने कब से हो रही है, लेकिन इस कार्यक्रम की रूपरेखा इन नीतिगत चीजों से काफी अलग है। जाहिर है कि इसी हिसाब से इस कार्यक्रम के सवालों का चयन भी किया गया होगा। बेशक, प्रधानमंत्री ने बच्चों के सवालों के जो जवाब दिए हैं, बहुत से लोग परंपरा के अनुसार उसका तार्किक विश्लेषण करने में भी जुटेंगे। लेकिन न तो सवालों और न ही जवाबों में ऐसा कुछ है कि उसे आलोचना की कसौटी पर कसने की कोेशिश की जाए।
यह ठीक है कि कांग्रेस नेता और पूर्व शिक्षा मंत्री कपिल सिब्बल ने इसकी आलोचना की है। उनका तर्क है कि यह बच्चों की परीक्षा का समय है, यह उनकी पढ़ाई और तैयारी का समय है, जबकि प्रधानमंत्री उनके बहुमूल्य समय को बर्बाद कर रहे हैं। कपिल सिब्बल जो कह रहे हैं, वह एक परंपरागत सोच है, जो आजकल बहुत मान्य नहीं है। इस सोच के हिसाब से परीक्षा के वक्त बच्चों को सिर्फ पढ़ाई करनी चाहिए और कुछ नहीं। नई सोच यह कहती है कि दूसरे कामों को छोड़कर सिर्फ परीक्षा की तैयारी से बच्चों में अनावश्यक तनाव पैदा होता है, जो परीक्षा में सफलता और विफलता, दोनों ही हालात में उनके लिए नुकसानदायक ही होता है। कई अध्ययन यह भी बताते हैं कि तनाव के कारण ही अक्सर बच्चे परीक्षाओं में अपनी क्षमतानुसार प्रदर्शन भी नहीं कर पाते। इस दौर में सबसे जरूरी होता है कि बच्चों को अच्छा करने की प्रेरणा दी जाए और उनका मनोबल बढ़ाया जाए। परीक्षा पर चर्चा कार्यक्रम से प्रधानमंत्री ने एक तरह से यही काम किया है। इस कार्यक्रम में एक सवाल अधिकार और कर्तव्य को लेकर भी था, लेकिन अच्छी बात यह है कि उन्होंने छात्रों से जो भी कहा, उसमें उन्हें कर्तव्यों का कोई लंबा-चौड़ा पाठ नहीं पढ़ाया। बच्चों से उनकी बातचीत में वह सहजता थी, जिसे लोग ऐसे मौकों पर अक्सर भूल जाते हैं।
कार्यक्रम की भूमिका प्रेरणा देने और मनोबल बढ़ाने तक सीमित है, इसलिए इससे कोई बड़ी उम्मीद भी नहीं रखी जानी चाहिए। शिक्षा के बड़े सवाल इससे हल नहीं होने वाले। शिक्षा में जिन बड़े बदलावों की जरूरत है, उनकी चर्चा हमेशा ही चलती रहती है, मगर हमेशा यह भी लगता है कि ये बदलाव अभी बहुत दूर हैं। ऐसे बदलाव करके परीक्षा पर चर्चा जैसे कार्यक्रमों की सार्थकता को और बढ़ाया जा सकता है।

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  • Web Title:Editorial Hindustan Column for 21 january