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थम गई उड़ान

 

आर्थिक उदारीकरण के दौर में भारत की पहली निजी विमानन सेवा कंपनी जेट एयरवेज के विमानों का परिचालन बंद होना जहां एक ओर अफसोसजनक है, वहीं दूसरी ओर, व्यवसाय प्रबंधन की दृष्टि से शर्मनाक भी है। जेट पर खतरे के जो बादल पिछले वर्ष से ज्यादा गहराने लगे थे, उनकी झलक वर्ष 2008 में ही मिल गई थी। धीरे-धीरे कंपनी का आकार बढ़ा, तो घाटे और उधारी के रूप में उसकी परेशानियां भी बढ़ती चली गईं। जिस नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने एक समय जेट के करीब 1,900 कर्मचारियों की नौकरी बचाई थी, वह आज खामोश है, जबकि आज जेट के 16,000 से ज्यादा लोगों की नौकरी खतरे में है। और यह सब कुछ ऐसे समय हो रहा है, जब चुनाव चरम पर है। सरकार चाहे भी तो कुछ खास नहीं कर सकती। जेट एयरवेज के निदेशक अगर सरकार से उम्मीद बांधे बैठे होंगे, तो आश्चर्य नहीं। यह एक सबक है कि निजी उद्यम का कोई भी सपना अपने ही दम पर देखना चाहिए। वे देश के लिए खुशनुमा दिन थे, जब उद्यमी नरेश गोयल ने वर्ष 1992-93 में अपने सपने को साकार किया था। अब जेट का वाकई पतन हो जाता है और उसकी तीन माह में वापसी नहीं होती है, तो यह भारत के प्रथम विमानन उद्यमियों में से एक नरेश गोयल के सपने की अविस्मरणीय मौत होगी। बेशक, इसके लिए वह खुद ही जिम्मेदार हैं। उन्हें समय रहते जागना चाहिए था। कुछ त्याग करते हुए भी अपने उस सपने को बचाना चाहिए था, जिससे अब कम से कम 16,000 लोगों के सपने प्रभावित होंगे। 
अर्थव्यवस्था में किसी उद्यम का अंत होता है, तो उसकी भरपाई में बाजार ज्यादा समय नहीं लगाता। एक वरिष्ठ उड्डयन अधिकारी ने बहुत सहजता से बता दिया है कि जेट की सेवा बंद होने पर घरेलू विमानन मोर्चे पर मात्र 75 विमानों की कमी हुई, दूसरी कंपनियों ने विगत पांच महीने में 58 नए विमान उतारे हैं, तो वस्तुत: भारतीय विमानन सेवा में केवल 17 विमान कम हुए हैं, यह कमी भी एक-दो महीने में दूर कर ली जाएगी। बेशक, जेट के बंद होने से दूसरी विमानन कंपनियों को फायदा होगा, लेकिन जेट के खाली विमानों के लिए सार्वजनिक क्षेत्र की विमानन कंपनी एअर इंडिया की उत्सुकता थोड़ी चकित करती है। एअर इंडिया स्वयं भी मोटे तौर पर 29,000 करोड़ रुपये के उधार पर है। भारत सरकार और करदाताओं के पैसे के दम पर उसकी सांसें चल रही हैं। जेट एयरवेज को 400 करोड़ से 1,000 करोड़ रुपये भी मिल जाते, तो वह चलती रहती, लेकिन एअर इंडिया को तो इस वित्त वर्ष में 9,000 करोड़ रुपये चुकाने हैं। यह भुगतान सरकार अपने खाते से न करे, तो एअर इंडिया पर भी ताले लगना लगभग तय हो जाएगा। 
जेट या एअर इंडिया ही नहीं, ऐसी अनेक सरकारी व निजी कंपनियां हैं, जिन्होंने अपने सतत घाटे व कुप्रबंधन से सबक नहीं सीखे हैं। ऐसी कंपनियां और उनके प्रबंधक केवल देश के विकास के साथ ही नहीं, देश के लोगों के जीवन के साथ भी खिलवाड़ करते हैं। जो आला अधिकारी और जिम्मेदार नेता रोजगार के नए अवसरों के सही आंकड़े तक नहीं बता पा रहे हैं, वे जेट और 16,000 नौकरियां बचाने के लिए क्या करेंगे, यह कहना मुश्किल है। लोग तो यही चाहेंगे कि सरकार यह सुनिश्चित करे कि कोई कंपनी बंद न हो और न कोई बेरोजगार हो।

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  • Web Title:Editorial Hindustan Column for 20 april