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चुनावी बिसात पर बजट

 

कई चीजें पहले और बाद में कितनी बदल जाती हैं, इसका सबसे अच्छा उदाहरण हमें शुक्रवार को लोकसभा में पेश किए गए केंद्रीय बजट से मिलता है। कुछ ही महीने बाद आम चुनाव हैं, इसलिए इस बार का बजट अंतरिम होना था और साथ ही यह भी कहा जा रहा था कि इस बार इसे पेश करने वाले वित्त मंत्री भी अंतरिम ही हैं। स्वास्थ्य समस्या होने के कारण इस सरकार में शुरू से ही वित्त मंत्री का पद संभाले अरुण जेटली का अमेरिका में इलाज चल रहा है और इसे देखते हुए अभी चंद रोज पहले ही पीयूष गोयल को वित्त मंत्रालय का कार्यभार दिया गया था। यानी एक ऐसे वित्त मंत्री बजट पेश करने जा रहे थे, जो बजट बनाने की पूरी प्रक्रिया में शायद शामिल भी न रहे हों। लेकिन शुक्रवार के उनके बजट भाषण में जो आत्मविश्वास दिखा, उससे तो यही लग रहा था, जैसे यह उन्हीं का बनाया हुआ बजट हो। चार्टेड एकाउंटेंट की पेशेवर महारत वाले पीयूष गोयल के लिए ऐसे आंकडे़ कोई कठिन चीज नहीं ही होंगे, लेकिन जिस सहजता से उन्होंने बजट को सदन के पटल पर रखा, उसमें शिकायत का कोई अवसर नहीं था। यानी वह किसी भी तरह से अंतरिम वित्त मंत्री नहीं लगे और जो बजट उन्होंने पेश किया, वह भी किसी तरह से अंतरिम बजट नहीं लगा। उसमें वह सब था, जो किसी भी पूर्ण बजट में होता है। कम से कम वे सभी चीजें तो थीं ही, जिनकी आम लोग एक बजट में उम्मीद करते हैं। तुरंत बाद की एक प्रतिक्रिया यह भी थी कि सरकार जिसे अंतरिम बजट कह रही है, वह एक सांता क्लॉज बजट है। वित्त मंत्री के झोले में इस बार हर किसी के लिए कुछ न कुछ अवश्य था।  
यह उस दौर का बजट था, जब हमारी अर्थव्यवस्था ने सीधे राहत पहुंचाने का एक नया नुस्खा निकाल लिया है- बैंक खाते में नगदी हस्तांतरण। हालांकि नगदी हस्तांतरण की योजना उतनी बड़ी नहीं थी, जितनी कि उम्मीद बांधी गई थी, लेकिन इससे देश के 12 करोड़ सीमांत किसानों को तो लाभ मिलेगा ही। कई राज्य ऐसी योजनाओं की झड़ी पहले ही लगा चुके हैं। लेकिन एक चीज जो वहां भी नहीं है और यहां भी नहीं दिखी, वह है इसे आर्थिक तौर पर तर्कसंगत बनाना। माना यह जाता है कि अगर विभिन्न तरह की सब्सिडी को खत्म कर दिया जाए, तो ऐसे नगदी हस्तांतरण से अर्थव्यवस्था पर ज्यादा दबाव भी नहीं बनेगा और सब्सिडी की जरूरत भी नहीं रहेगी। लेकिन देखने में यह आ रहा है कि सरकारें नगदी हस्तांतरण को लेकर जितना उत्साह दिखा रही हैं, उतनी सक्रियता वे सब्सिडी खत्म करने में नहीं दिखा रहीं। बजट में आयकर सीमा बढ़ाने के कदम की सबसे ज्यादा चर्चा है। यह एक ऐसा फैसला है, जिसका लंबे समय से इंतजार था।
पीयूष गोयल के बजट पर एक त्वरित टिप्पणी तो यही हो सकती है कि इसने लोगों को एक फील गुड वाला एहसास दिया है। अब यह एहसास लोगों के दिल-दिमाग पर कितने दिनों तक बरकरार रहेगा, अभी नहीं कहा जा सकता। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह एहसास आम चुनाव तक टिकेगा? और फिर जिन लोगों की झोली इस सरकार ने राहतों और रियायतों से भरी है, क्या वे इसके बदले में सत्ताधारी गठबंधन की झोली भी वोटों से भरेंगे? यह सच है कि नोटबंदी और उसके बाद जीएसटी ने बहुत से लोगों को निराशा दी है, क्या इस बजट के बाद ऐसे निराश लोगों का अनुपात कुछ कम होगा?

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  • Web Title:Editorial Hindustan Column for 2 february