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दूसरे चरण में बंधी उम्मीद

 

आम चुनाव के  लिए दूसरे चरण के मतदान का रुझान भी लगभग वही रहा, जो पहले चरण का था। लगभग वही उत्साह और वही बाधाएं, जो पहले चरण में थीं। पहले चरण के मुकाबले दूसरे चरण के मतदान का भूगोल काफी विस्तृत था। कश्मीर के श्रीनगर में भी मतदान था और तमिलनाडु में भी। दूसरे शब्दों में, इसे इस तरह भी कह सकते हैं कि कश्मीर से कन्या कुमारी तक 11 राज्यों में लोकसभा की 95 सीटों के लिए मोटे तौर पर शांतिपूर्ण मतदान हुआ। पश्चिम में अगर लोकसभा की दस सीटों के लिए मतदान हुआ, तो सुदूर पूर्वोत्तर में मणिपुर की एक सीट के लिए भी। सिर्फ इसका भूगोल ही व्यापक नहीं था, स्थितियां भी भिन्न-भिन्न थीं। ऐसे क्षेत्र में भी मतदान हुआ, जहां आस-पास चंद घंटे पहले ही बर्फबारी हुई थी और ऐसे इलाके में भी मतदान हुआ, जो कुछ समय पहले ही आंधी-तूफान और बरसात से जूझ रहे थे। एक तरफ वे किसान भी बड़ी संख्या में मतदान के लिए आए, जिनकी फसलों को इस मौसम ने नुकसान पहुंचाया, दूसरी तरफ विदर्भ और मराठवाड़ा के उस क्षेत्र में भी किसानों ने भारी तादाद में वोट डाले, जहां पिछले मौसम में पर्याप्त बारिश नहीं हुई और उनके खेत अभी भी भयंकर सूखे से जूझ रहे हैं। भारी मतदान वाले इलाकों में छत्तीसगढ़ का वह कांकेर लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र भी है, जहां माओवादी आतंक का खतरा हरदम मंडराता रहता है। इनमें से हर जगह मतदाता इस उम्मीद के साथ मतदान केंद्रों पर उमड़े कि उनका वोट यह सूरत बदल 
सकता है।
राजनीतिक दृष्टि से देखें, तो यह शायद चुनाव का सबसे महत्वपूर्ण चरण था। लोकसभा की जिन 95 सीटों के लिए मतदान हुआ, उनमें से 65 सीटें पिछली बार भाजपा और उसके सहयोगी दलों ने जीती थीं। यानी अगर सत्ताधारी पार्टी को सत्ता में बने रहना है, तो उसे कम से कम पिछली बार के प्रदर्शन को दोहराना होगा, जबकि विपक्षी दल अगर उसे सत्ता से हटाना चाहते हैं, तो उन्हें इस दौर में ही राष्टीय जनतांत्रिक गठबंधन को शिकस्त देनी होगी। हालांकि आम चुनाव की पूरी लड़ाई को देखें, तो अभी बहुत कुछ शेष है। आगे भी कुछ दौर ऐसे आएंगे, जहां सत्ता के लिए होने वाली टक्कर और कठिन हो सकती है। 
टक्कर कितनी कड़ी थी, इसका एक अंदाज इससे भी लगाया जा सकता है कि सभी राजनीतिक दलों ने अपने सारे घोड़े खोल दिए थे। प्रचार और आक्षेप जितने निचले स्तर पर पहुंचे, शायद इसके पहले के किसी चुनाव में नहीं पहुंचे थे। उम्मीदवारों और उनके लोगों के पास से जितनी नकदी इस दौर में जब्त हुई, उतनी पिछले किसी चुनाव में नहीं हुई थी। कड़ी चुनावी टक्कर के साथ ही गलत गतिविधियों का बढ़ना एक बुरी खबर है। संतोष यही है कि इस दौरान चुनाव आयोग ने अच्छी भूमिका निभाई और सख्त फैसले किए। बड़बोले और बिगड़े बोल बोलने वाले नेताओं के प्रचार करने पर पाबंदी लगाना ऐसा ही फैसला था। भारी मात्रा में नकदी की बरामदगी के बाद वेल्लोर के चुनाव को रद्द करना आयोग का एक और सख्त फैसला है। आयोग के इन फैसलों का असर कहीं न कहीं आने वाले मतदान के चरणों में दिखाई देगा। हालांकि हमारे नेता और राजनीतिक दल रातोंरात सुधर जाएंगे, इसकी उम्मीद नहीं बांधी जा सकती, लेकिन चुनाव आयोग ने संदेश दे दिया है कि अगर गड़बड़ी हुई, तो वह हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठेगा। 

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  • Web Title:Editorial Hindustan Column for 19 april